कलम संगिनी

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जे न मित्र दुख होंय दुखारी

adi.s.mishra

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जे न मित्र दुख होंय दुखारी

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जे न मित्र दुख होंय दुखारी
जे न मित्र दुख होंय दुखारी जे न मित्र दुख होंय दुखारी, ताहि विलोकत पातक भारी, बिछुड़ा मित्र सालों बाद मिला, तो मिलकर बहुत अच्छा लगा। बचपन में संग संग खेला था, हँसना खेलना सब साथ था, पर जीवन की आपाधापी ऐसी, इतने सालों मिलना नहीं हुआ। बाल सखा जब फिर से मिले, तब मिलकर बहुत अच्छा लगा, जैसे कृष्ण को सुदामा मिले, मिलकर भूल गये शिकवे गिले। आदित्य हम मित्र जब फिर मिले, आधी शताब्दी बीत चुकी थी, पाकर मित्रों को कुछ ऐसा लगा, कि सगा भाई ही हो मिल गया। डा. कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’ लखनऊ: 30 अगस्त 2025

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