"रूख के पानी"
छत्तीसगढ़ी कविता
मौलिक रचना
रूख कहिथे चुपचाप, पानी मोर जान आय,
माटी मं समा जाथे, तब हरियर प्रान आय।
घाम-बरसात सहिथौं, छाया मैं देथौं,
एक घूंट पानी खातिर, जीवन भर देथौं।
जड़ मं बस गे सपने, डार मं आस लहराय,
पानी बिना रूख बिनस जाही, धरती रोय-रोय।
मनखे अगर समझ जाही, रूख के ये गुहार,
बच जाही ये धरती मं, जीवन के आधार।
पानी बचा ले मनखे, रूख संग निभा नाता,
रूख बांचे तं बांचे, तोर-हमर ये साता।
रचनाकार
कौशल
18.01.2026
रूख के पानी
रूख के पानी
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