कलम संगिनी

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ललित कला और काव्य कौमुदी

adi.s.mishra

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ललित कला और काव्य कौमुदी

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ललित कला और काव्य कौमुदी
ललित कला और काव्य-कौमुदी ललित कला है प्रवीणता, तो भावों का उद्गार है कविता, वैचारिक साधना है कविता, ईश्वर प्रदत्त उपहार है कविता। शृंगार, करुण, वीभत्स, वीर रस, अद्भुत, रौद्र, भयानक, शान्त रस, वात्सल्य प्रेम व भक्ति विनय रस, कवि की रचना के हैं यश अपयश। रस धार बने जैसे कविता की, आभूषित अलंकार कर देते, शब्द, अर्थ के अलंकार कविता, सुरसरि सुरभित मोहित कर देते। अनुप्रास, यमक, श्लेस शब्दों से कवि की रचना का मान बढ़ाते, शब्दों का शब्दों से मिलना, संयोग सरस सम्मान बढ़ाते । उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, भ्रांतिमान, संदेह, विभावना, मानवीकरण कर अतिशयोक्ति कृत सब अलंकार, पाठक को निहित अर्थ में उलझाते। श्लोक, सवैया, कुंडलियाँ, बरवै, छन्द, सोरठा, दोहा और चौपाई। छप्पय, गीत, ग़ज़ल रचि रचि दें, कविकुल काव्य कला दिखलाई। काव्य- पिपासा स्वांत: सुखाय है, सर्वे भवंतु सुख़िन: सब जनहिताय है। काव्य कौमुदी, कला कौमुदी समाज, के जीवन की सर्वे संतु निरामया: हैं। वैचारिक संशोधन, साहित्य सृजन गतिशील सामाजिक तत्वज्ञान है। ‘आदित्य’ कवि की काव्य कल्पना, सामाजिक जीवन का इक दर्पण है। डा. कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’ लखनऊ

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