कलम संगिनी

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*पहला कदम* (स्वरचित कविता)

*पहला कदम* (स्वरचित कविता)

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*पहला कदम* (स्वरचित कविता)
*पहला कदम* (स्वरचित कविता) पहला क़दम जब भीतर पड़ा, सांसों ने कुछ संकेत कहा। मौन हुआ मन, थम गई भाषा, कुछ देखा जो अब तक न देखा॥१॥ नेत्र खुले पर दृष्टि नई थी, छाया में भी जो रौशनी थी। धड़कन में वह नाम गूँजता, जैसे हर पल बस वही थी॥२॥ चुपचाप चला था पथ साधक, ना लक्ष्य स्पष्ट, न कोई रेखा। पर एक पुकार थी अंतर से, "अब लौट न जाना, तू रेखा"॥३॥ पहला क़दम जब ध्यान बना, प्रश्नों से मन पहचान बना। जो मैं था, वह मैं न रहा अब, "मैं" से "वह" तक सारा गगन॥४॥ हर श्वास बनी जब जप समर्पण, हर सोच बनी जब मौन वंदन। तब ज्ञात हुआ यह पंथ सदा से, था भीतर ही, था अर्पण॥५॥ पहला कदम ही द्वार बने, उस सत्य का जो पार खड़ा। जो 'मैं' के पार स्वयं बसे, वही 'अहम् ब्रह्मास्मि' का कड़ा॥६॥ 🙏 योगेश गहतोड़ी "यश" नई दिल्ली - 110059 मोबाईल: 9810092532

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