आये शबनम बहार बन कर के
आये शबनम बहार बन कर के,
मैं खोजूँ तुम्हें तुम्हारा प्यार बन के,
हसरतें हमारी परवान चढ़ रही हैं,
इस गुले गुलिस्ताँ में बहार बन के।
आये शबनम बाहर बन कर के ।
ज़िंदगी अधूरी हो जाएगी ये पूरी,
आबाद गुलिस्ताँ, रह जाये न दूरी,
चले आओ हमराह हमजिगर मेरे,
महफ़िले मुक़द्दस में हार बन के।
आये शबनम बहार बन कर के।
इबादत हमारी मोहब्बत है तेरी,
दस्तूरे दुनिया ख़ैर ख़्वाह बन के,
इस अंजुमन नज़र के हो फ़रिश्ते,
आदित्य की इबादते यार बन के।
आये शबनम बहार बन कर के।
डा. कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
लखनऊ
आये शबनम बहार बन के
आये शबनम बहार बन के
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