**शीर्षक: "माटी के मया"
विधा - कविता
श्रेणी - प्रकृति
छत्तीसगढ़ी में सांस्कृतिक सौंदर्य और प्रकृति के संगम पर आधारित है।।
छत्तीसगढ़ मोर, माटी के सुगंध बासे,
संस्कृति के रंग, हिरदे मा समाय बसे।
पंडवानी के स्वर, गीत पुरखा के गाय,
हर बस्ती मा, मया के दीया जलाय।
राउत नाच के ताल, खेतन मा गूँजय,
बस्तर के डफली, मन ला हरषाय लजाय।
सुआ नाच के रंग, गाँव के चौक सजाय,
छत्तीसगढ़ी संस्कृति, दुनिया ला मोहाय।
महानदी के किनारा, कर्मा के गीत सुनाय,
हर झांकी मा, परंपरा के दीप जलाय।
महुआ के मिठास, जीव मा मया घोलय,
हर तीज-तिहार, संस्कृति के रंग खोलय।
बस्तर के मुरिया, जंगल के कहानी गाय,
दंतेवाड़ा मा, माँ दंतेश्वरी सजाय।
चंदैनी के गोंदा, प्रेम के राग सुनाय,
इहाँ के हर गीत, आत्मा ला हरषाय।
हरियल खेत, धान के लहर लहराये,
गंगा-जमुना संस्कृति, इहाँ मया बरसाये।
रतनपुर के मंदिर, भक्ति के दीप जलाय,
छत्तीसगढ़ के माटी, विश्वास ला समाय।
बिलासा के कथा, इतिहास ला संजोये,
हर गाँव-नगर, परंपरा के रंग बोये।
पंथी नाच के ताल, सतनाम के जय गाय,
इहाँ के संस्कृति, हिरदे मा सदा बसाय।
जंगल, पहाड़, नदिया, सब मया के सानी,
छत्तीसगढ़ी संस्कृति, मोर जीव के रानी।
हर तीज-त्यौहार, एकता के गीत सुनाय,
इहाँ के हर रंग, मन ला शांति लाय।
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रचनाकार -कौशल , मुड़पार चु, पोस्ट रसौटा, तहसील पामगढ़, जिला जांजगीर चांपा छत्तीसगढ़
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