कलम संगिनी

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सम्बंधों का निभाना

adi.s.mishra

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सम्बंधों का निभाना

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सम्बंधों का निभाना
सम्बन्धों का निभाना सम्बंध जितना पुराना होता है मजबूत ही होता जाता है, जितना एक दूसरे की फ़िक्र होती उतना ही सम्मान पाता है। लिखा थोड़ा, परंतु समझा तो अधिक ही जाता है, मिलना हो पाये या नहीं, महसूस मगर हो जाता है। भूमि और भाग्य का स्वभाव जैसे, जो बोया वही निकलता है, सच्चाई व ईमानदारी से बना सम्बंध प्रकृति जैसा ही बढ़ता है। सच्चे सम्बन्धों में विनम्रता, आदर सद्भाव, आभारी होना, और क्षमा करना व क्षमा माँग कर सबका प्रिय बन जाना। ऐसे अद्भुत गुण होते हैं जो सबको क़रीब ले आते हैं, अपने तो अपने होते हैं पराये भी प्रायः अपने बन जाते हैं। उम्मीदें अच्छे सम्बन्धों की हम सबकी आश बंधाती हैं, उम्मीदों का धीरज धारणकर बिलगाव को दूर भगाती हैं। मंदिर में बंधा घंटा जब कोई बजाता है तो ही बजता है, प्रभु की भक्ति से ही विनती करने का फल मिलता है। सम्बन्ध निभाने की ख़ातिर भावों का एहसास जताना, एहसास जताकर औरों को है ज़रूरी महसूस कराना। त्याग, प्रेम, एहसान मानना प्रिय से प्रियतम बन जाना है, आदित्य सदा सन्मति देकर रिश्तों की सम्पत्ति बनाना है। डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’ लखनऊ

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