रावण विद्वान, बलवान, धनवान था, ब्राह्मण था पर चरित्रवान नहीं था, अहंकारी था इसीलिये सवंश उसका समूल नाश हुआ । आगे पढ़ें :-
आजकल सोशल मिडिया पर एक ट्रेंड बहुत तेजी से चल पड़ा है, रावण के बखान का कि वो एक प्रकांड पंडित था ; उसने माता सीता को कभी छुआ नहीं ; अपनी बहन के अपमान के लिये पूरा कुल दाव पर लगा दिया ।
अर्रे भाई माता सीता को ना छूने का कारण उसकी भलमनसाहत नहीं बल्कि कुबेर के पुत्र “नलकुबेर” द्वारा दिया गया श्राप था..।
कभी लोग ये कहानी सुनाने बैठ जाते हैं कि एक मां अपनी बेटी से ये पूछती है कि तुम्हें कैसा भाई चाहिये..? बेटी का जवाब होता है..रावण जैसा... जो अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिये सर्वस्व न्योंछावर कर दे.। भद्रजनो..ऐसा नहीं है....
रावण की बहन सूर्पणंखा के पति का नाम विधुतजिव्ह था..; जो राजा कालकेय का सेनापति था..,जब रावण तीनो लोको पर विजय प्राप्त करने निकला तो उसका युद्ध कालकेय से भी हुआ,जिसमे उसने विधुतजिव्ह का वध कर दिया, तब सूर्पणंखा ने अपने ही भाई को श्राप दिया कि, तेरे सर्वनाश का कारण मै बनूंगी..।
कोई कहता है कि रावण अजेय था...जी नहीं.. प्रभु श्री राम के अलावा उसे राजा बलि, वानरराज बाली , महिष्मति के राजा कार्तविर्य अर्जुन और स्वयं भगवान शिव ने भी हराया था..!!
रावण विद्वान अवश्य था, लेकिन जो व्यक्ति अपने ज्ञान को यथार्थ जीवन मे लागू ना करे, वो ज्ञान विनाश कारी होता है..। रावण ने अनेक ऋषिमुनियों का वध किया, अनेक यज्ञ ध्वंस किये, ना जाने कितनी स्त्रियों का अपहरण किया..यहां तक कि स्वर्ग लोक की अप्सरा “रंभा” को भी नहीं छोड़ा..!!
एक गरीब ब्राह्मणी, “वेदवती” के रूप से प्रभावित होकर जब वो उसे बालों से घसीट कर ले जाने लगा तो वेदवती ने आत्मदाह कर लिया..और वो उसे श्राप दे गई कि तेरा विनाश एक स्त्री के कारण ही होगा..!!!
रावण को सिर्फ इसलिये अपना ईष्ट नहीं माना जा सकता कि वो एक ब्राह्मण था; इष्ट कर्म प्रधान होना चाहिए ना कि जाति प्रधान..?
अपने आराध्यों मे जाति ढूंढना छोड़कर जरुरी है अपने जेहन मे श्री राम को जिन्दा रखना, क्यूंकि सिर्फ पुतले जलाने से रावण नही मरा करते ।
अब रावण की महिमा गाना बंद करने के कारण इस कहानी से स्पष्ट हो जाएगा :-
एक बार स्वर्ग की अप्सरा रंभा रावण के भाई कुबेर के पुत्र नलकुबेर से मिलने जा रही थी। रास्ते में रावण ने उसे देखा और वह रंभा के रूप और सौंदर्य को देखकर मोहित हो गया। रावण ने रंभा को बुरी नीयत से रोक लिया। इस पर रंभा ने रावण से उसे छोडऩे की प्रार्थना की और कहा कि आज मैंने आपके भाई कुबेर के पुत्र नलकुबेर से मिलने का वचन दिया है अत: मैं आपकी पुत्रवधु के समान हूं अत: मुझे छोड़ दीजिए। परंतु रावण था ही दुराचारी वह नहीं माना और रंभा के शील का हरण कर लिया।
रावण द्वारा रंभा के शील हरण का समाचार जब कुबेर देव के पुत्र नलकुबेर का प्राप्त हुआ तो वह रावण पर अति क्रोधित हुआ। क्रोध वश नलकुबेर ने रावण को श्राप दे दिया कि आज के बाद यदि रावण ने किसी भी स्त्री को बिना उसकी स्वीकृति के अपने महल में रखा या उसके साथ दुराचार किया तो वह उसी क्षण भस्म हो जाएगा। इसी श्राप के डर से रावण ने सीता को राजमहल में न रखते हुए राजमहल से दूर अशोक वाटिका में रखा।
अब सोचिए रावण की विद्वता , बलशाली होना और धनवान होने मात्र से उसे इष्ट देव कैसे माना जाता जब कि वह चरित्रहीन, अहंकारी व दुराचारी था ।
जय श्री राम, जय जय सिया राम।
डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
लखनऊ
रावण की विद्वता और अहंकार
रावण की विद्वता और अहंकार
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