कलम संगिनी

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आदित्यायन साहित्य दर्पण

adi.s.mishra

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आदित्यायन साहित्य दर्पण

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आदित्यायन साहित्य दर्पण
*रोशने-नूर, शहनाई की धुन* आपने अपना सुकोमल हृदय अपने अजीज मित्रों के लिये पूरी तरह खोल कर रख दिया है, इसमें दुआ भी, आशीष भी है। आपका ये नजराना, आपकी ये, दुआयें सबको सहर्ष स्वीकार हैं, ये दोस्त आपके जितने क़रीब हैं, दिल की याद में रहते भले दूर दूर हैं। रोशने-नूर, शहनाई की धुन हैं, अनवरे रोशन गुलाब के फूल हैं, ऐ खुदा तूने सवारा मुझे इन रत्नों से, सब तेरी निगाहें-करम आबाद हैं। याद करता हूँ दिन-रात आदित्य को, उनकी मधुर - मंजुल वाणी को, उनके उन्नत विचारों, ख़यालों को, और पसंदीदा अनवरे - रोशन को। ज्योतिर्विद्या रत्न कर्नल द्विवेदी को, उच्चकोटि कलाकार मुरलीमनोहर को, मित्र सुदर्शन चक्र, पुरस्कार कुञ्ज, आदित्य के कविता साहित्य वैभव को। मेरे प्यारे गुलेरिया भाई जान, संगीतवेत्ता कल्याण डोरले, नारायणा गारू, एम सुंदरम, यादें सबकी मधुरम-मधुरम। मित्र मोतियों हीरे जवाहरात से अनमोल गोरे, सोलोमन, देवीसिंह चौहान, राघवन को, जैयराज, सम्पत, कुलदीप को। मुकेश कपिला, रोशने-नूर और भूले बिसरे सभी मित्रों को, मो. अनवारुल हक ‘महक’ की फ़रियाद ऐ मेरे खुदा को। लेफ्टिनेंट कर्नल मो. अनवारुल हक़, ‘महक’ सेवानिवृत, हैदराबाद

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