*ऐसी ज्योति जले*
ऐसी ज्योति जले हे भगवन
दशो दिशा का मिटे अंधेरा,
ज्योतिर्मय हो धरती अम्बर
रहे न किंचित कहीं अंधेरा।
ऐसी गंग बहा दो भगवन
सारा जग पावन हो जाए,
क्लेश कांति अरु मलिन भ्रांति
सब दूर भगा कर
तन मन सब निर्मल हो जाए।
ऐसी स्वर लहरी लहरा दो
हे वीणा वादिनि शारदा माता,
अंतर्मन झंकृत हो जाए
सुमधुर सुर संगीत सजाता।
ऐसा पुष्प खिलाओ वनमाली
सारा जग सुरभित हो जाए,
हरी भरी हो धरती माता
बाग बगीचा सब मुस्काए।
रंग बिरंगी तितली रानी
उड़ उड़ कर के जाती है,
देख देख नन्हीं कलियों को
राग भैरवी गाती हैं।
भौंरे भैया भी उड़ उड़ कर
गुंजन करते जाते हैं,
पुष्प पराग मधुर रस लेकर
भैरव राग सुनाते हैं।
प्रकृति का सौंदर्य देख कर
मन प्रफुल्लित होता है,
प्रभु की ऐसी रचना न्यारी
मन उसमें खो जाता है।
सुभद्रा द्विवेदी, लखनऊ
ऐसी ज्योति जले
ऐसी ज्योति जले
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