🌸 *ब्रह्मचारिणी – एक कहानी* 🌸
बहुत समय पहले की बात है, हिमालय की ऊँची-ऊँची चोटियों में, पर्वतराज हिमालय और रानी मैना के घर एक सुंदर कन्या का जन्म हुआ। उसका नाम पार्वती रखा गया। बचपन से ही पार्वती बहुत अलग थीं। जहाँ अन्य बच्चे खेल-कूद में मस्त रहते थे, वहीं पार्वती को प्रकृति में रहना, नदी की कल-कल ध्वनि सुनना और फूलों से देवी-पूजा करना बहुत भाता था। उनके मन में हमेशा एक अजीब-सी शांति और गंभीरता रहती थी, जैसे वे किसी बड़े उद्देश्य के लिए जन्मी हों।
एक दिन पार्वती घूमते-घूमते जंगल में ऋषियों के पास गईं और उन्होंने भगवान शिव के बारे में सुना। ऋषियों ने बताया, “शिव विरक्त योगी हैं। वे संसार के मोह-माया से दूर रहते हैं और ध्यान में लीन रहते हैं।”
यह सुनते ही पार्वती का हृदय शिव की ओर आकर्षित हो गया। उन्होंने मन ही मन सोचा, “यही मेरे जीवन का सत्य है, यही मेरे जीवनसाथी होंगे।”
पार्वती ने ऋषियों को अंतोगत्वा अपने मन की बात बता दी, तब ऋषियों ने समझाया, “बेटी, शिव को पाना आसान नहीं है। उनका हृदय किसी आकर्षण से नहीं झुकता। उन्हें प्रसन्न करने के लिए कठोर तप और संयम से उनकी भक्ति करनी पड़ती है।"
पार्वती ने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया, “चाहे आँधियाँ चलें, चाहे पर्वत टूट पड़ें, मैं अपने संकल्प से अब पीछे नहीं हटूँगी।”
इसके बाद पार्वती ने राजमहल का वैभव त्याग दिया। आभूषण, रेशमी वस्त्र और स्वादिष्ट भोजन सब छोड़कर साधारण वस्त्र पहनकर वे वन में चली गईं। उन्होंने जंगल में फल-फूल खाए, फिर केवल जल पर निर्भर रहीं। धीरे-धीरे उन्होंने वायु को ही अपना आहार बना लिया।
कभी उन्हें बरसात की ठंडी बूँदें भिगोतीं, कभी बर्फ की सर्दी झुलसा देती, कभी धूप उन्हें तपाकर जलाती और कभी जंगल की नीरवता डराती, लेकिन उनका मन अडिग रहा। हर कठिनाई ने उनके संकल्प को और अधिक मजबूत किया।
उनकी तपस्या देखकर पशु-पक्षी उनके पास निडर होकर बैठने लगे। अधिकतर हिरण उनके पास आकर शांति से बैठ जाते थे। ऋषि-मुनि भी उनकी भक्ति देखकर चकित रह गए। उनकी तपस्या की चर्चा देवताओं तक पहुँच गई।
देवता चिंतित होकर ब्रह्मा के पास गए और बोले, “देव! पार्वती की तपस्या का फल केवल शिव ही बता सकते हैं।”
अंत में भगवान शिव स्वयं पार्वती के सामने प्रकट हुए। उनकी आँखों में करुणा और गंभीरता थी। उन्होंने कहा, “देवी, तुम्हारा तप और संयम असाधारण है। प्रेम केवल आकर्षण नहीं है, यह त्याग और धैर्य की ज्वाला है। तुमने सिद्ध कर दिया कि सच्चा समर्पण असंभव को भी संभव बना सकता है। आज से तुम्हें संसार *"ब्रह्मचारिणी"* नाम से पूजेगा।”
पार्वती की आँखों से प्रेम और आनंद के आँसू बह निकले। उन्हें लगा जैसे पूरी सृष्टि उनके संकल्प की गवाही दे रही हो।
तब से पार्वती, *"माँ ब्रह्मचारिणी"* के रूप में पूजित हुईं। नवरात्रि के दूसरे दिन जब भक्त उनकी आराधना करते हैं, तो वे केवल देवी को नहीं, बल्कि अपने भीतर की शक्ति, संयम और धैर्य को भी प्रणाम करते हैं।
इस कहानी से यह संदेश मिलता है कि अटूट विश्वास, दृढ़ संकल्प और तपस्या से कोई भी कठिन मार्ग पार किया जा सकता है और व्यक्ति परमसत्य या परमात्मा की प्राप्ति कर सकता है। नवरात्रि के दूसरे दिन *माँ ब्रह्मचारिणी* की पूजा इसी शक्ति, संयम और धैर्य का स्मरण कराती है।
✍️ योगेश गहतोड़ी "यश"
ब्रह्मचारिणी – एक कहानी
ब्रह्मचारिणी – एक कहानी
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