कलम संगिनी

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लोक आस्था व पवित्रता का प्रतीक महापर्व छठ

adi.s.mishra

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लोक आस्था व पवित्रता का प्रतीक महापर्व छठ

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लोक आस्था व पवित्रता का प्रतीक महापर्व छठ
*लोक आस्था एवं पवित्रता का महाव्रत छठ* छठ पूजा भगवान सूर्य देव और उनकी भगिनी (बहन) छठी मइया (ऊषा देवी) की उपासना के लिए की जाती है। जहाँ सूर्य देवता जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य के प्रतीक हैं, वहीं छठी मइया संतान, समृद्धि तथा कल्याण की महादेवी हैं। अधिकांश पूजा-पाठ करवाने में आचार्य या पुरोहित की उपस्थिति होती है, परन्तु इस पर्व में पंडित या पुरोहित अथवा किसी विशेष मंत्र या विधि-विधान की जरूरत नहीं होती। छठ पूजा पूरी तरह श्रद्धा, आस्था और पवित्रता पर आधारित होती है। इसमें व्रती स्वयं पुरोहित और यजमान बनकर पूजा करते हैं। पहले दिन नहाय-खाय से लेकर दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन संध्या अर्घ्य और चौथे दिन प्रातःकालीन अर्घ्य तक हर चरण में केवल लोक आस्था और भक्ति की भावना प्रमुख होती है। ऐसी सहजता, सरलता और समर्पण छठ पूजा को अत्यंत विशिष्ट और पवित्र बनाते हैं। इस साल 25 अक्तूबर से महापर्व छठ पूजा की शुरुआत हो गई है। चार दिनों तक चलने वाला यह पावन पर्व पूरे उत्साह और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। अगले दिन 26 अक्तूबर को खरना पूजन होगा। इस दिन व्रती पूरा दिन उपवास रखते हैं और सूर्यास्त के बाद छठी मैया को प्रसाद चढ़ाकर अपना उपवास तोड़ते हैं। यह प्रसाद परिवार और मित्रों में भी वितरित किया जाता है। खरना के दिन सुबह जल्दी उठकर घर की अच्छी तरह सफाई के बाद नहा-धोकर साफ और आरामदायक वस्त्र पहनें जाते हैं। पूजा-पाठ संपन्न करके शाम को दोबारा स्नान कर नए या साफ कपड़े पहनते हैं। महिलाएं धोती या साड़ी पहनती हैं जो स्थानीय परंपरा पर निर्भर करता है। आम की लकड़ियों से आग जलाकर प्रसाद (भोजन) तैयार किया जाता है। प्रसाद तैयार होने के बाद सबसे पहले छठी मैया को भोग लगाया जाता है। पूजा संपन्न होने के बाद व्रती कुछ समय वहीं बैठकर माता का ध्यान करते हैं। छठ पूजा में बांस से बनी कई वस्तुओं का उपयोग किया जाता है, जिनमें सूप सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। सूप को सूर्य पूजा का अनिवार्य हिस्सा कहा गया है, क्योंकि इसके बिना यह अनुष्ठान अधूरा माना जाता है। सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते समय सूप का प्रयोग किया जाता है। इसमें फल, ठेकुआ और अन्य प्रसाद रखकर श्रद्धा के साथ सूर्य भगवान को समर्पित किया जाता है। यह सूप न केवल पूजा का साधन है, बल्कि भक्ति और परंपरा का प्रतीक होता है। तीसरे दिन पूरी श्रद्धा भक्ति के साथ डूबते सूर्य को अर्घ्य समर्पित किया जाता है और रात्रि जागरण भी किया जाता है। चौथे यानी अंतिम दिन उगते सूर्य को पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ अर्घ्य समर्पित कर व्रत का परायण या समापन किया जाता है। छठ महापर्व पर मेरी एक कविता भी यहाँ प्रस्तुत है: *आस्था, विश्वास व सूर्यदेव की उपासना का वृतपर्व छठ पूजा* छठ महापर्व एक ऐसी वृत पूजा है, जिसमें पंडित पूजा नहीं कराता है, जिसमें सूर्य देव प्रत्यक्ष अर्ध्य लेते और डूबते सूर्य को पूजा जाता है। जिसमें वृती जातिवर्ग से परे होते हैं, जिसमें बस लोकगीत गाये जाते हैं, जिसमें पकवान घर में ही बनाते हैं, जिसमें घाट पर ऊँचनीच नही होते हैं। जिसमें प्रसाद अमीर-गरीब सभी पूर्ण श्रद्धा भक्ति से ग्रहण करते हैं, जिसमें निरंतर छत्तीस घंटे तक वृती बिना खाये पिये पूर्ण वृत रखते हैं। यह सामाजिक सौहार्द, सदभाव, आस्था, विश्वास, शांति, समृद्धि, पवित्रता व सादगी का महापर्व है, आदित्य बधाई व शुभ कामनायें हैं। डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’ लखनऊ: 25-10-2025

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