*मांसाहार* (स्वरचित आलेख)
पंचपातक में वर्णित "मांसाहार" तीसरा पातक माना गया है, जो शरीर, मन और आत्मा तीनों की पवित्रता को कलुषित कर देता है। यह केवल जीवहत्या का अपराध नहीं, बल्कि करुणा और संवेदना की हत्या भी है। जब मनुष्य किसी प्राणी के प्राण को अपनी "स्वाद की लालसा" के लिए छीनता है, तब वह अपने भीतर के धर्म और दया के बीज को भी नष्ट कर देता है।
ऋग्वेद (१०.८७.१६) कहता है —
*“अघ्न्या यः पयस्वतीः प्रुष्णिरग्रे दुहानाम्।”*
अर्थात् उन प्राणियों को मत मारो जो तुम्हारे पालन-पोषण का कारण हैं।
मांसाहार से उत्पन्न तामसिकता मन को मलिन करती है, जिससे विवेक मंद पड़ता है और क्रोध, हिंसा, अहंकार जैसी प्रवृत्तियाँ बलवान हो जाती हैं।
यजुर्वेद (३६.१८) का संदेश है —
*“मां हिंस्यात् सर्वा भूतानि।”*
अर्थात् किसी भी प्राणी की हिंसा मत करो।
यह वेदवाक्य समस्त जीवों में एक ही चेतना के दर्शन का आधार है और वही चेतना ब्रह्म है। अतः जो उस चेतना की अवहेलना करता है, वह ब्रह्म से विमुख होकर अधर्म की ओर बढ़ता है। इसी कारण पंचपातक में मांसाहार को आत्मविनाश की दिशा में ले जाने वाला घोर पतन कहा गया है।
मानव को मांसाहार नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह केवल जीवों की हिंसा नहीं, बल्कि मनुष्य की अंतःकरणीय करुणा की हत्या है। हर जीव में वही प्राण विद्यमान है जो हमारे भीतर है।
ईशावास्य उपनिषद् (मंत्र १) कहता है —
*“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।”*
अर्थात् सम्पूर्ण सृष्टि में ईश्वर का वास है।
इसलिए किसी जीव की पीड़ा ईश्वर की उपेक्षा के समान है।
मांसाहार तामसिक आहार है, जो मन में आलस्य और असंवेदनशीलता बढ़ाता है; जबकि शाकाहार मन को सात्त्विक बनाकर शांति, विवेक और करुणा प्रदान करता है।
मनुस्मृति (५.४८) में कहा गया है —
*“योऽहिंसां सर्वभूतानि कामयेत् स सुखं भजेत्।”*
अर्थात् जो सभी प्राणियों के प्रति अहिंसा रखता है, वही सच्चा सुख प्राप्त करता है।
भगवद्गीता (१७.७–१०) में श्रीकृष्ण कहते हैं कि तामसिक आहार दुःख, मोह और रोग को बढ़ाता है। अतः जो योग और ध्यान के मार्ग पर चलता है, उसे मांसाहार से दूर रहना चाहिए।
वैदिक युग में यज्ञों में पशुबलि की चर्चा प्रतीकात्मक थी। “पशु” का अर्थ देहधारी जीव नहीं, बल्कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, अहंकार जैसे मनोविकार हैं।
शतपथ ब्राह्मण (१.२.३.६) में स्पष्ट कहा गया है —
*“पशुं यजेत् — आत्मनं यजेत्।”*
अर्थात् यज्ञ का अर्थ आत्मबलिदान है, न कि जीवबलिदान। उपनिषदों में यह बलिदान आत्मशुद्धि का प्रतीक है जो भीतर के विकारों का दहन, जो वास्तविक यज्ञ है।
भागवत पुराण (११.५.१४) में कहा गया है —
*“यस्तु सर्वाणि भूतानि हिंस्रते स नराधमः।”*
अर्थात् जो प्राणियों की हिंसा करता है, वह नराधम है।
स्कंद पुराण में मांसाहार करने वाले को अगले जन्म में पशुयोनि प्राप्त होने का उल्लेख है।
मांसाहार केवल शरीर को नहीं, बल्कि मन की संवेदना को भी कुंठित करता है। जब किसी की भूख किसी दूसरे के प्राण पर निर्भर होती है, तब वह करुणा की ज्वाला को बुझा देती है।
अथर्ववेद (१२.१.४५) कहता है —
*“अहिंस्रं सर्वभूतानां मित्रं भव।”*
अर्थात् सब जीवों के प्रति अहिंस्र और मैत्रीभाव रखो।
*"वेदांत का सार यही है कि दया ही धर्म का मूल है।”* चरक संहिता और सुश्रुत संहिता दोनों कहते हैं कि स्वस्थ व्यक्ति के लिए सात्त्विक आहार ही श्रेष्ठ है, क्योंकि वही ओज, आत्मसंयम और आयु को बढ़ाता है।
महाभारत (अनुशासन पर्व ११६.३८) में भीष्म पितामह युधिष्ठिर से कहते हैं —
*“न हिंस्यान्नान्यथा भूतानि।”*
अर्थात् प्राणी-हिंसा से सदैव दूर रहो।
उनका यह भी कहना है कि जो व्यक्ति बिना आवश्यकता मांस खाता है, तो यज्ञ, दान या तप करने से भी उस पाप को धो नहीं सकता।
जैन और बौद्ध परंपराओं ने भी वेदों की अहिंसा-भावना को आगे बढ़ाया। महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध ने कहा — *“अहिंसा परमो धर्मः।”* यह वही वैदिक विचार है जो कहता है — *“सर्वभूतेषु आत्मानं पश्येत्”* (कठोपनिषद् २.१.१०)।
आज विज्ञान भी यह सिद्ध कर चुका है कि मांसाहार स्वास्थ्य, पर्यावरण और पारिस्थितिकी के लिए हानिकारक है। पशुपालन से निकलने वाली गैसें, भूमि और जल का अत्यधिक उपयोग तथा जीवों की क्रूर हत्या यह सब प्रकृति के संतुलन को नष्ट करते हैं।
वेदों की शिक्षा — *“अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्”* (तैत्तिरीय उपनिषद् ३.२) यह आज भी उतनी ही सत्य है, क्योंकि अन्न ही जीवन का आधार और ब्रह्म का प्रतीक है।
मांसाहार, पंचपातक का एक प्रमुख पातक है, जो मनुष्य को धर्म से विमुख कर अधर्म की ओर ले जाता है। यह केवल जीवहत्या नहीं, बल्कि करुणा, दया और धर्म की हत्या है। वेदों ने स्पष्ट कहा है — *“मां हिंस्यात् सर्वा भूतानि”* किसी भी प्राणी को कष्ट मत दो, क्योंकि सभी में वही ब्रह्म-चेतना विद्यमान है। मांसाहार तामसिक आहार है, जो मन में क्रोध, अहंकार और असंवेदनशीलता को बढ़ाता है; जबकि शाकाहार सात्त्विक होकर विवेक, शांति और करुणा को जाग्रत करता है। इसलिए मांसाहार का त्याग आत्मशुद्धि और धर्मपालन दोनों का सर्वोच्च प्रतीक है।
*“अतः मांसाहार का त्याग केवल धार्मिक आचरण नहीं, बल्कि आत्मिक उत्कर्ष और सार्वभौमिक करुणा का साक्षात् साधन है।”*
🙏 योगेश गहतोड़ी "यश"
नई दिल्ली - 110059
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*मांसाहार* (स्वरचित आलेख)
*मांसाहार* (स्वरचित आलेख)
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