कलम संगिनी

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निःशब्द प्रेम

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निःशब्द प्रेम
निशब्द प्रेम की परिभाषा ********************* ह्रदयस्थल में जागृत, प्रेम की बयार हो तुम । नग्न चक्षु से दृश्यपटल पर, अनुभूति की बहार हो तुम। जो भिगा दे मन को , वह वर्षा की फुहार हो तुम । जीवन में अमृत भर दे, वह पीयूष की धार हो तुम । सख्त हृदय को को पिघला दे , अग्नि की वह धार हो तुम। बिन कुछ कहे सबकुछ कह दे , ऐसे शब्दों की कटार हो तुम। मिष्ठी वाणी से रस घोले , ऐसा है तुम्हारा प्रेम रसदार। खुशियों से जीवन को भर दे, मेरे जीवन का आधार। स्वरचित पंक्तियां प्रतिभा दिनेश कर विकासखण्ड सरायपाली

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