कलम संगिनी

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भावपल्लवन -या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता

भावपल्लवन -या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता

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भावपल्लवन -या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता
भावपल्लवन श्लोक: या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के तृतीय अध्याय से लिया गया है, जिसे कभी-कभी देवी महात्म्य या चण्डीपाठ भी कहा जाता है। इस ग्रंथ में माँ दुर्गा के विविध रूपों, उनके गुणों और भक्तिपथ का विस्तृत वर्णन मिलता है। विशेष रूप से यह श्लोक माँ चंद्रघंटा के स्वरूप का परिचय देता है। इस रूप में देवी के मस्तक पर अर्धचंद्राकार घंटा प्रतिष्ठित है, जो केवल आभूषण नहीं बल्कि उनके उच्चतम चेतना और दैवी जागरण का प्रतीक है। चंद्रघंटा रूप में माँ साहस, वीरता, करुणा, न्यायप्रियता और आंतरिक शक्ति की प्रतिमूर्ति हैं। यह श्लोक साधक को यह संदेश देता है कि देवी केवल मंदिरों, मूर्तियों या बाहरी पवित्र स्थानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हर प्राणी, प्रत्येक जीव और समस्त सृष्टि में उनकी दिव्य शक्ति विद्यमान है। शब्दार्थ के अनुसार, "या" का अर्थ है वह, जो देवी हैं; "देवी" ईश्वरीय शक्ति को दर्शाता है; "सर्वभूतेषु" सभी प्राणियों में विद्यमान होने का भाव व्यक्त करता है; "मां" देवी को सम्बोधित करते हुए प्रयुक्त हुआ है; "चंद्रघंटा" का अर्थ है वह देवी जिनके मस्तक पर चंद्र के आकार की घंटा शोभायमान है; "रूपेण" का अर्थ रूप में; "संस्थिता" विद्यमान या प्रतिष्ठित; "नमस्तस्यै" उसे प्रणाम करना और "नमो नमः" बार-बार अत्यधिक श्रद्धा और सम्मान के साथ प्रणाम करना है। इस प्रकार श्लोक का भाव यह है कि सभी प्राणियों में विद्यमान, चंद्रघंटा रूप धारण करने वाली देवी को बार-बार प्रणाम करना चाहिए। नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा विशेष महत्व रखती है। इस दिन साधक अपने भीतर के भय, असुरक्षा, संशय और मानसिक अशांति को दूर करने हेतु देवी का आह्वान करते हैं। उनके जाप और ध्यान से साधक के हृदय में साहस, आत्मबल, मानसिक शांति और संतुलन का जागरण होता है। चंद्रघंटा का नाम स्वयं उनके स्वरूप का प्रतीक है। चंद्रमा सौम्यता, शांति, करुणा और शीतलता का प्रतीक है, जबकि घंटा जागरण, ऊर्जा, साहस और दुष्टों के नाश का संकेत देती है। इस प्रकार उनके स्वरूप में शांति और वीरता का अद्भुत संगम दिखाई देता है। आध्यात्मिक दृष्टि से माँ चंद्रघंटा का अर्धचंद्र मस्तक पर समय और जीवन के चक्र का स्मरण कराता है। यह साधक को यह समझने में मदद करता है कि जीवन में परिस्थितियाँ निरंतर बदलती रहती हैं और हर स्थिति में सजग, सतर्क और संतुलित रहना आवश्यक है। उनके मस्तक पर स्थित घंटा साधक के लिए चेतना और जागरण का प्रतीक है। घंटा की ध्वनि नकारात्मक विचारों, भय और अज्ञान को दूर कर दैवी चेतना का जागरण करती है। यह साधक के भीतर साहस, निडरता और आत्मविश्वास उत्पन्न करती है, जिससे वह अपने जीवन में सही निर्णय और धर्मरक्षण कर सके। माँ चंद्रघंटा के दस भुजाओं में धारण किए गए अस्त्र-शस्त्र भी गहन दार्शनिक संदेश देते हैं। त्रिशूल तीन गुणों—सत, रजस, तमस—के संतुलन का प्रतीक है। तलवार अज्ञान और अंधकार का नाश करती है, गदा शक्ति और संकल्प का संकेत देती है, धनुष-बाण लक्ष्य पर एकाग्रता और स्थिरता का प्रतीक हैं, और कमल आध्यात्मिक जागरण और करुणा का प्रतिनिधित्व करता है। ये दस भुजाएँ केवल भव्यता का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि ब्रह्मांड के दस दिशाओं पर देवी के नियंत्रण और संरक्षण का संकेत देती हैं। उनका वाहन सिंह अपराजेय साहस, अदम्य शक्ति और निडरता का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि देवी केवल करुणामयी माता नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए उग्र शक्ति भी हैं। जब अधर्म और अन्याय बढ़ता है, तब सच्ची भक्ति और साहस का अर्थ होता है कि साधक धर्म और सत्य की रक्षा के लिए निर्भय होकर खड़ा हो। श्लोक में प्रयुक्त “सर्वभूतेषु” शब्द यह संदेश देता है कि दिव्य शक्ति प्रत्येक जीव में विद्यमान है। जब साधक दूसरों में भी उसी देवी-शक्ति को पहचानता है, तो करुणा, समता, सहयोग और सहानुभूति की भावना उत्पन्न होती है। चंद्रघंटा की सौम्यता साधक में संवेदनशीलता, शांतचित्तता और विवेकशीलता का विकास करती है, जबकि घंटा की गूंज साहस, सक्रियता और आत्मविश्वास का संचार करती है। उनकी साधना साधक के भीतर धर्मरक्षण, न्यायप्रियता और आत्मबल उत्पन्न करती है। माँ चंद्रघंटा साधना का मूल संदेश भय और अज्ञान का नाश करते हुए साहस, करुणा और विवेक का संतुलित विकास करना है। उनके माध्यम से साधक अपने भीतर की दिव्य शक्ति को जागृत करता है और जीवन में आत्मसशक्तिकरण, मानसिक स्थिरता और संतुलन प्राप्त करता है। नवरात्रि के तीसरे दिन उनकी पूजा से साधक में साहस और करुणा का संतुलन, न्यायप्रियता, धर्मरक्षा और समाज व प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण उत्पन्न होता है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र और हाथ में घंटा, दस भुजाएँ, अस्त्र-शस्त्र और सिंह वाहन—सभी मिलकर साधक के भीतर जीवन में संतुलन, साहस और दिव्य चेतना का जागरण करते हैं। इस प्रकार, माँ चंद्रघंटा साधक को यह सिखाती हैं कि सच्चा साहस केवल बाहरी संघर्ष में ही नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन, विवेक और करुणा के साथ जीवन जीने में निहित है। उनके जाप, ध्यान और साधना से साधक न केवल स्वयं के लिए, बल्कि समाज और प्रकृति के प्रति भी संतुलित दृष्टिकोण और जिम्मेदार जीवन जीने की क्षमता प्राप्त करता है। ✍️ योगेश गहतोड़ी "यश" (ज्योतिषाचार्य) मोबाईल: 9810092532 नई दिल्ली - 110059

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