कलम संगिनी

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बरसों बाद घर जाना….

adi.s.mishra

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3 Followers 147 Posts Aug 2025

बरसों बाद घर जाना….

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बरसों बाद घर जाना….
*बरसों बाद घर जाना ...* माना बरसों हो गए तुमसे मिले हुए, पर यादो में हमेशा संग थे हम। बरसो बाद तुम से मिलकर यूँ लगा, मानो बस इसी मुलाकात के इंतजार में थे हम। पिछले दिनों बेटे ने यूँ ही गाँव के बारे में अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए कई सारे प्रश्न पूछे उससे बाते करते करते लगा क्यों न बच्चो को गाँव घुमा लाया जाये फिर क्या था तुरंत पापा को फोन किया अपनी इच्छा बताई उनको तो जैसे बिन मांगी मुराद मिल गई बिना एक पल गवायें कब जायेंगे कैसे जायेंगे कौन कौन जायेगा तय कर डाला और ..... लगभग 15 साल बाद अपने गाँव अपने जन्मस्थान जाना हुआ। इन 15 सालो में कई बार लखनऊ से कानपुर जाना हुआ था पर तब बस उन्नाव को पार करते हुए बाये तरफ अपने गाँव को जाती हुई सड़क को दूर तक जी भर के देख लेती थी मन होते हए भी समय अभाव के चलते कभी उस तरफ मुड़ना न हो पाया और एक अफ़सोस का भाव लिए काम निपटा के फिर वापसी हो जाती थी ..... । खैर हम लखनऊ कानपूर हाइवे से बाये चंद्रिका देवी द्वार होते हुए बीघापुर -ऊँचगाँव हाइवे पर पहले सीधे माँ चन्द्रिका देवी मंदिर गए जो बक्सर इलाके की स्थान देवी है ....। पहले माँ गंगा के दर्शन किये गए, इस छोर से उस छोर तक फैले गंगा के पाट पर कई तरह के नज़ारे देखने को मिले ..... कुछ लोग आस्था की डुबकी लगा रहे थे तो कुछ सिर्फ किनारे खड़े मछलियों को दाने डाल रहे थे....कई कश्तियाँ जलविहार करा रही थी .....दूर नजर डालने पर उस पार किसानो द्वारा की गई बुवाई दिख रही थी। शायद खीरा, तरबूज बोया गया हो होगा ...... इसके बाद हम गंगा किनारे ही बने चन्द्रिका देवी मंदिर दर्शन को गए ...काफी ऊँचाई पर भव्य मंदिर बनाया गया है। उस में विराजमान स्वर्णआभा लिए माँ चन्द्रिका देवी की मूर्ति बहुत सुंदर लगती है, मंदिर भी साफ़ सुथरा है व माहौल भी शांत ....गंगा की तरफ से आती ठंडी हवा के झोके सुखद अनुभुति करा रहे थे ... देवी दर्शन के बाद हम शिव जी और हनुमान जी की प्रतिमाओं को प्रणाम कर वापिस अपने गंतव्य को चले ... रास्ते में वहाँ की प्रसिद्ध मिठाई “कुसली” एक प्रकार की गुझियाँ ली गई और वहीँ ऊँचगाँव में बसी अपनी छोटी बहन के घर जाया गया उससे भी बड़े दिनों बाद मुलाकात हुई थी औपचारिक हाल चाल लिया परिवार से मिले, चाय नाश्ता किया और आगे बढ़ लिए ... थोडा दूर पहुचने पर अफ़सोस हुआ कि बात ही करते रह गए साथ में एक तस्वीर भी नही ली फिर लगा अच्छा ही है आज कल हम लोग तस्वीरों में ही ज्यादा मिलते है आज तो सच में मिल के आये है ......और फिर कुछ देर में हमारी गाडी बीघापुर -ऊँच गाँव हाइवे छोड़ ‘सथनी बाला खेडा’ हमारे गाँव की तरफ मुड़ गई .....लिखना मुश्किल है पर कई भाव .. यादें .. तैलचित्र की भांति आखों के सामने से गुजरने लगे ... बचपन से इस रास्ते पर न जाने कितनी बार गुजरना हुआ होगा ....पर आज ये ख़ास था अपने बच्चों का अपनी जन्मभूमि से परिचय कराने के लिए लाई थी.... मन ही मन बाबा- दादी और बड़ी माँ को याद किया जो अब हमारे साथ नही है जैसे जैसे आगे बढ़ते गए ....सब याद आता गया यहाँ कौन रहता था यहाँ क्यों आते थे ....और खेतों को पार करते हुए कुछ ही देर में ही अपने दरवाजे पर थे .... बगल वाले चाचा जी को बता रखा था तो वो इंतजार करते मिले ... और इंतजार कर रहा था हमारा बरसों पुराना बरगद का पेड़ .... बाबा का चबूतरा ...दादी का कोना ....यहाँ तक तो आ गए थे पर अब लग रहा था कि ना आते तो अच्छा था क्यूंकि हमेशा हसीं ठिठोली से गुलजार चौबारा एक दम शांत था ..... हमेशा दरवाजे पर खड़ी मिलती बैलगाड़ी अब कही नही थी ....बचपन में हमेशा सजधज के हमे मुख्य मार्ग तक लेने आती थी और छोड़ने भी साथ चलती थी .....पुराने घर के चबूतरे पर बैठी दादी नही थी .... नये घर के चबूतरे पर बैठे बाबा जी नही थे .... गय्या की चरही खाली - सुखी पड़ी थी.... सामने की फूलवाड़ी में सिर्फ झाड़ियाँ दिख रही थी कुल मिला के अजीब सा सूनापन था ....चारो तरफ एक सन्नाटा सा पसरा था जो खटक रहा था .... दोनों घर की दीवारे भी झरने लगी है .....बरसों पुराना कुआँ भी अब सुख गया था अपनी तस्सल्ली के लिए उसमे कंकड़ डाल कर भी देखा पर सन्नाटा ही रहा ....... बस सामने लहलहाती गेहूं की बालियाँ कुछ सुकून दे रही थी .....खैर अपने जज्बातों को सम्हालते हुए ....अपनी ढेहरी पर पहुंचे आस पास लगे जालो को किनारे करते हुए ... ताला खोला गया और किवाड़ की सांकल हटा घर खोला गया.... किवाड़ को खोलते हुए दादी का किवाड़ और चौखट के बीच फंसा कर गुड की भेली फोड़ना याद आया ....सबसे पहले ही एक छाता टंगा दिखा ...जिससे बाबा जी याद आये कि कैसे वो भरी दुपहरी गर्मियों में खेतो में जाते थे .....इतवार की हाट से हमारे लिए कलिंदा (तरबूज) लाया करते थे, बारिश के दिनों में यही छाता ले कर छत पर जमा पानी को निकालने जाते थे...। एक तरफ और भीतर जाने की दालान थी दूसरी तरफ बखारी (अनाज रहने की जगह) हमेशा अनाज से भरी रहने वाली बखारी आज खाली थी वहां कुछ कुछ यूँ ही रखा था ....दालान की तरफ मुड़े और कोने पर रखे जांत (एक तरह की हाथ चक्की) पर नजर पड़ी बच्चे तो उसे घुमाने फिराने भी लगे ....माँ ने सबको बताया कि पहले कैसे सभी महिलाएं भोर में ही गेहूँ और दाल वगैरह पीसती थी .... आगे बढ़ने पर जैसे ही आंगन में पहुचे एक बड़ा झटका लगा ....हमारे घर को कबूतरों ने अपना घर बना लिया था। वो तो भला हो खुले आंगन का जो किसी तरह की गंध नही थी आज कल के शहरी घरों तो दो दिन भी बंद रहे तो एक अजीब सी गंध आने लगती है .... एक एक दिवार को, दरवाजे को गौर से देखा हर कोने से गुजरे दिनों को झांकते पाया, हम सबको देख मुस्कुराते पाया ....... किसी ने सही कहा है “घर और पेड़ अंत समय तक हमारी सुरक्षा करते है बिना कुछ खोये अपना आखिरी कण तक न्यौछावर करते रहते है”। हमेशा इस आँगन में घर वालों को खूब हँसी ठिठोली करते ही देखा था....रोज खाने के लिए इकट्ठा होते थे .... कभी आम की दावत को ..... कभी यूँ ही गप बाजी के लिए ..... कभी कभी तो कौन ज्यादा खा सकता है इसकी प्रतियोगिता तक कर डालते थे, ये बात और थी कि रोटियां सेकेनें वाली महिलाओं को दुबारा तिबारा तैयारी करनी पड़ जाती थी .......इसी आंगन में जन्म से लेकर शादी तक के जश्न मनाये जाते थे .... कभी बन्ना बन्नी गाये जाते थे तो कभी सोहर ..... पर आज हम आठ – दस लोग यहाँ थे जरुर पर आपस में बतियाने से कतरा रहे थे ...... एक दूसरे से नजरे तक नही मिला रहे थे घर की इस हालत पर विचलित थे। शायद इतने दिनों तक न आने का पछतावा था जो मौन में ही व्यक्त हो रहा था ....। सामने की घनौची (पानी रखने की जगह) को खाली देख याद आया कैसे शाम के वक़्त सब भाई बहन मिल कर घर के सामने अपने ही कुँए से पानी लाकर गागर भरते थे बाद के वर्षो में हैन्डपम्प भी लग गया था ......इसीलिए आज कुआँ सूख गया है यह याद करते करते मन ही मन हसीं भी आई क्योंकि मै तो बाबा जी के पास बैठ जाया करती थी कभी ये घर वाले काम नही किये .....सब दीदियाँ और छोटी बहन घर के कामों में हाथ बटाते थे ..... उस समय गोबर की लिपाई हुआ करती थी ....सब बहने आपस में जगह बाँट लेती थी ....आज होता तो शायद मै भी कुछ करती पर तब कभी हाथ नही लगाया .... गाँव आने पर सिर्फ खाया पिया घुमा खेला ...ज्यादा हुआ तो अखबार पढ़ कर सुना देती थी या अपने साथ लाइ गई किताबों को पढ़ कर क्या आता है उसका प्रमाण दे दिया करती थी वो भी कितने अच्छे दिन थे .....वो बचपन के दिन ... आंगन के एक तरफ रुसैयाँ (रसोई) और उसके भी भीतर भंडार घर ( स्टोर) ... एक तरफ खमसार (लम्बा दालान) और एक तरफ कोठरी (कमरा) ....किसे पहले देखे यही सोच रहे थे कि माँ ने भैया से बोला की रसोई खोल दो कम से कम देव पूजन तो कर लूँ .... दरवाजे की सांकल कुछ ज्यादा ही जोर लगी थी दो लोगो ने मिलकर खोला ..... फिर अतीत सामने खड़ा हो गया और बटुई में बनने वाली सोंधी दाल की....बड़ी सी कढाई मे खौलते ताज़ा दूध .... हाथो से पई गई बाजरे की रोटियां.....और खास मौको पर बनने वाली मलाईदार गाढ़ी खीर की खुशबु याद आने लगी .... अब यहाँ कुछ न था पर क्यूंकि ये माँ का कार्यस्थल था उन्होंने बच्चों को बताना शुरू किया कि यहाँ कैसे मिट्टी के चूल्हे होते थे कैसे लकड़ी और कन्डो पर खाना पकाया जाता था .... बड़े बड़े थाल और बटोलियाँ देख बच्चो को लगा हम किसी म्यूजियम में आ गए ...हमे भी याद आया कि कैसे कांसे और फुले के बर्तनों में ही खाना खाया पकाया जाता था और उस समय जो रसोई के अंदर होता था वो तब तक बाहर नही आता था जब तक सब लोग खाना खा न ले ....एक्सौस्ट की जगह बस एक बड़ा सा छेद था छत पर जिसे शायद धुवारा कहते थे ....आंगन की तरफ खुली खिड़कियाँ ही ताज़ी हवा का जरिया थी नही तो ये रसोई पूरी तरह से बंद थी ......अब यहाँ भी एल पी जी उपलब्ध है इसलिए चूल्हा गायब है और गैस की बीमारी आबाद हेहेहे ...... खैर माँ ने अपने कुलदेवता को प्रणाम किया ....सब तरफ निगाह डाली और हम रसोई से बाहर आ गए। अब बारी थी दालान की तरफ जाने की ....जैसे ही आँगन से खमसार को बढ़े, दो तीन कबूतर सर्र्र से बगल से होते हुए आंगन के रस्ते ऊपर को भागे ....ये विशेष तौर पर महिलाओं की जगह थी हर नई दुल्हन को सबसे पहले यहीं आ कर आराम करने को मिलता था .... जहाँ कभी सब महिलाये हंसी ठिठोली करती थी वहां अब बस ये कबूतर गुटर गु करते हैं...... यहाँ भी एक चक्की है असली काम यही होता था ...कूटने पिसने का .... मूसल नही दिखे पर काँडी अभी भी निशानी के तौर पर बनी हुई है ...वही एक तरफ घर का मंदिर था ....कुछ अलमारिया, आले टांड .. कुल मिलाकर सामान रखने की जगह ....और आगे जा कर जीना जो छत को जाता है .....बीच में एक तरफ एक स्टोर जैसा था जहाँ कभी खटाई, अचार और सिरके रखे जाते थे ....पर बाद के वर्षो में वहां शौचालय बना दिया गया अब पूरी तरह बंद है किसी ने देखा भी नही उसे .....और ऊपर बढ़ चले छत पर पहुँच गए ...फिर कई सारी बाते याद आ गई ...हम क्यूंकि सिर्फ गर्मियों की छुट्टियों में आ पाते थे तो सर्दियों का गाँव भी नही देख पाते थे गर्मियों में शाम का ज्यादातर समय यहीं छत पर बीतता था ....पानी का छिड़काव कर ....सब अपनी अपनी खटिया लगा लेते थे ..... बिस्तर पर भी पानी का छिड़काव कर देते थे जिससे सोते समय तक बिस्तर ठंडा हो जाये ......मुझे याद है कि मै शायद कभी कभार ही यहाँ सोई होउंगी क्यूंकि मेरी जगह दादी के बगल में सुरक्षित थी और वो बाहर वाले दरवाजे पर सोती थी ...एक छोटे से खटोले में मै और वो दोनों ...दादी मुझे नखत (तारो ) की दिशा से समय बताती थी ..आले बाले वाली भेडि़ये और बकरी के बच्चो की कहानी सुनाती थी, महावीर बाबा (हनुमान जी )को याद कर के सोने की ताकीद करती थी।इसिलिये शायद जब बाद के बरसो में आस्था जगी तो हनुमान जी को ही परसादी चढ़ाई इसके पीछे कारण बेसन के लड्डू की पसंद भी हो सकता है हाहाहा .... खैर आज हमको जो कमरे की बत्ती भी बुझा के सोते है शायद इस खुली छत पर नींद भी न आये ....चारो तरफ घुम घाम के बच्चो को बताया कैसे एक घर से दूसरे घर यही छत से चले जाते थे .... छुपन –छुपाई खेलने में कितना मजा आता था .. बर्फ वाले की आवाज़ सुन इसी छत से उसे अपने दरवाज़े आने की आवाज़ लगाते थे ....किसी के दरवाजे से निकली बारात को यही से देख लेते थे ...बारात से याद आया पहले जब लड़कियों की विदाई होती थी तो वो रोते रोते घर में कहाँ क्या रखा है ये अपने माँ पापा को बताते जाती थी कि बाद में उन्हें तकलीफ न हो क्यूंकि फोन की सुविधा तो होती नही थी उस जमाने में ....। घर के पिछवाड़े देखने पर लोगो के दरवाजे पर गाय बकरी बैल बंधे थे इन्हें देख कर बच्चो को लगा हाँ सच में गाँव में जानवर होते है कभी हमारे दरवाजे भी थे पर अब ...... और भी बहुत कुछ याद किया और नीचे आ गए ... नीचे आकर एक और बंद कमरा देखा बच्चो को लगा यही खजाने का कमरा होता होगा क्यूंकि आज भी वहां एक पुराना बड़ा सा बक्सा रखा है और कुछ पुराने बरतन, बिस्तर आदि .....वैसे ये सब खजाना ही तो है ये भी न हो तो तो बस यादे ही है। इसके बाद बाहर आये और नए घर की तरफ गए यहाँ हालत ठीक थी बाबा की लाठी और खडाऊ अपनी जगह रखी थी......चारा काटने की मशीन थी जिसे बच्चे आता चक्की कह रहे थे ....... खेती किसानी के सब औजार रखे थे और भी बहुत कुछ .... बस कोई रहने वाला न था न ही हमेशा बंधे रहने वाले गाय –भैंसे ... घर के बाहर बरसों पुराने बरगद के पेड़ का चबूतरा भी अब समाप्त प्राय हो गया है, कभी ये बरगद पूरे गाँव की सुहागिनों की बरगधाई (बरगद पूजा) कराता था अब न जाने वो कहाँ जाती होंगी .... शायद यही समय है। अब समय हो गया था खाना खाने का बस मन न था .... खाना हम साथ ही लाये थे क्यूंकि पता था की यहाँ न बना पाएंगे और चाचा चाची को तकलीफ नही देना चाह रहे थे ....उनके रहते नाश्ता पानी मिल गया था यही बहुत था ...खैर सबने पुआ पुड़ी सब्जी और फ़्राईड राईस का सेवन किया और फिर निकल गए गाँव की ओर… सबसे पहले अपने शिव मंदिर “कुटी बाबा” के दर्शन किये बच्चो को लगा वो किसी ऐतिहासिक जगह आ गए है क्यूंकि मंदिर में शिवलिंग के अलावा बहुत सी अन्य खंडित मूर्तियाँ और कई प्रकार के पत्थर रखे हुए थे .... बच्चों को बताय कि कैसे रोज सब लोग स्नान कर पहले यहाँ जल चढाते थे फिर खाना खाते थे और ये नियम था .....शाम को भी नियम से दिया बत्ती और भोग लगाने आते थे ...... यहाँ आ कर अच्छा लगा क्यूंकि यहाँ अभी भी लोग आ कर साफ सफाई करते हैं पूजापाठ करते हैं बाबा की ये निशानी पुरे गाँव की आस्था स्थली बनी हुई है। इसके बाद चले खेतो की ओर .....अब पापा की बारी थी खेत खलियान से परिचय कराने की ....खलियान क्या होता है यहाँ कैसे काम होता है अपने खेत कौन से है क्या लगा है सब दिखाया बच्चों को...... “बवारा” (हमारा किचन गार्डन) पार कर हम खेतो को गए .... मैंने बच्चो को बताया कैसे हम अपने बचपन में दो खेतो के बीच की नहर में भैस को उतार कर बैफलो राइड करती थी ...आगे कुम्ह्र्गढ़ा तालाब मिला हमारे बचपन का स्विमिंग पूल हाहाहा ......... आम - जामुन के पेड़ों के झुंडो ने याद दिलाया कि बचपन में दिशा मैदान से वापसी में आम ले जाकर बखारी में छुपा देते थे और फिर एक दूसरे का चुरा के खाने में ही मज़ा लेते थे ..... वो स्वाद वो मिठास अब नही मिलती ..... सब जगह की खूब तस्वीरे ली ....। गाँव घुमने पर पता चला कि गाँव में अब विकास की बयार चल रही है इसकी कई निशानियाँ भी दिखने लगी है एक स्वास्थ्य केंद्र बन रहा है, इफ्को वालो ने एक तरणताल बनाया है कच्ची गलियां पक्की सड़क में बदल गई हैं, कुयें सूख गए हैं हैण्ड पम्प झमाझम चल रहे है ... दिशा मैदान को जाने वाले कम हो गए है क्यूंकि अधिकांश घरो में शौचालय बन गए है ....पर अफ़सोस अब सिर्फ कुछ ही लोग गाँव में रह गए है बाकी रोजगार या बेहतर जीवन की चाहत में शहरो को चले गए है। अब शाम हो चली थी और हमारी भी वापसी होनी थी सो वापस घर आये सब दुबारा बंद किया ......खेतो की देखभाल करने वाले सेवको ने अपना हिसाब किताब बताया भैया ने फिर आने की बात कही, चाचा - चाची का अभिवादन किया उन्होंने भी बच्चो को आम की दावत पर आने का वादा लिया और हम नम आँखों और भारी मन से चल पड़े वापिस फिर आने की सोच कर ....पर पता नही कब आयेंगे .... अगले कुछ दिन इन्ही सब यादो को दोहराते बीते और बच्चो के सवालों के जवाब देते ...आज दो हफ्ते बाद ये सब लिख कर लगा की एक और चक्कर लगा आई आने वाले दिनों में पढ़ कर ही घूम लुंगी .....अपनी ददिहाल। रंजना द्विवेदी, लखनऊ

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