कलम संगिनी

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पितृ तर्पण

पितृ तर्पण

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पितृ तर्पण
काव्य- ""पितृ तर्पण "" जीवंत में बन न सके, मात-पिता भगवान । पितर आते ही देते गरीब ब्राह्मण को, नित रोज पकवान।। माँ-बाप को रोटी पानी, सम्मान मिले, अपनापन। यही है सबसे बड़ा तर्पण, यही है सच्चा जीवन धन। जीते जी जो सेवा करता, उसका जीवन होता महान। मृत्यु पश्चात श्राद्ध से बढ़कर, जीवन्त काल में सेवा ही पिंडदान। आओ करें प्रण हर दिन निभाएं , जीते जी सेवा कर हम सभी दिखाएं। स्वरचित काव्य श्रीमती प्रतिभा दिनेश कर विकासखंड सरायपाली जिला महासमुंद छत्तीसगढ़

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