कलम संगिनी

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तोल मोल के बोल

adi.s.mishra

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तोल मोल के बोल

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तोल मोल के बोल
तोल मोल के बोल तोल मोल के बोल, क्या कहीं सिखाया जाता है, कैसे बोलो, क्या क्या बोलो, क्या कहीं पढ़ाया जाता है। ठीक से बोलो, यह मत बोलो, वह मत बोलो, किससे बोलो, कब कब बोलो, कितना बोलो, बोलो भी या कुछ मत बोलो। यह नही सिखाया जाता है, यह नही बताया जाता है, साधारण सी बात है कि किसी क्लास में नहीं पढ़ाया जाता है। बच्चा जब तुतलाता है, बेटा बोलो मम्मा, पापा, नाना बोलो, मुन्नी बोलो नानी, दादी बोलो, बोलो बुआ या फूफा बोलो। तब ये बच्चे जीभ चलाते, होंठ घुमाते बोल बोल तुतलाते हैं, बाल सुलभ चेष्ठा भी करते, ये बाल चरित सब भाते हैं। यही चेष्ठा, यही कोशिशें बच्चों को बोलना सिखाती हैं, उनकी तुतलाती वाणी उनके बोलने की क्लास कहाती हैं। माता पिता, परिवार, पड़ोसी व सारे सभी सगे सम्बन्धी, बच्चों के घर के शिक्षक होते हैं, ये ही कक्षा भी है उनकी। विद्यालय में अध्यापक का पाठ्य पुस्तक से सिखलाना, दिन प्रति दिन आदान प्रदान का बार बार अभ्यास कराना। आचार व्योहार के यही नियम, बचपन से लेकर युवापन तक, इंसान सीखता रहता, प्रौढ़ावस्था से लेकर अंतिम साँसों तक। कब, क्या, कैसे, किससे बोलना है या चुप रहना है, आदित्य हमारी यही क्लास है, बोलना और सीखना है। डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’ लखनऊ

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