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शिर्षक : पत्थर
विधा : कविता
श्रेणी : आध्यात्मिक
रचनाकार : कौशल
(सोलह मात्रा छंद — मौलिक रचना)
पत्थर में भी प्राण बसें, पर हम उसको पहचान न पाए,
ठोकर मारें राह चलें, फिर मंदिर में पूजें सिर झुक जाए।
चूल्हा बनकर अन्न खिलाए, दीवारों-सा घर थामे देखो,
पथ बनकर हमको राह दिखाए, फिर भी जग अपमान दिखाए।
चंदन, पुष्प, आरती पाकर, देव रूप में पूजित हो जाए,
धैर्य तपस्या चुपचाप सहे, वाणी से प्रतिकार न लाए।
जो हर पीड़ा सहकर भी मुस्काए, पत्थर से यह सीख मिलाए,
हर परिस्थिति में स्थिर रहकर, मन को दृढ़ता में भर लाए।
मूर्ति बनकर श्रद्धा पाता, चक्की बनकर अन्न दिलाए,
मील पत्थर बन मार्ग बताए, जीवन का हर सत्य सिखाए।
मन पत्थर यदि हो जाए तिमिर, करुणा का दीप जले न पावे,
फिर मानवता किस काम की, जब हृदय में प्रेम न जागे।
धूप, वर्षा, आँधियाँ झेलें, किंतु न त्यागे धीरज अपना,
घाव अपार पड़े तन पर पर, सहता ही जाए मौन सलोना।
शिव के माथ सुशोभित होकर, गंगा संग पावन हो जाए,
भक्त तिरथ में डुबकी लगाकर, पाप जला कर तट लौट आए।
हृदय हमारा पत्थर जैसा, सत्य-धर्म पर अडिग रह जाए,
असत्य के समक्ष न झुकना, पर जो सत्य हो शीश झुक जाए।
मोक्ष मार्ग पर वही बढ़ेगा, धीरज जिसका मित्र कहाए,
मौन उपासना में रत रहकर, जीवन का सार समझ पाए।
पत्थर की निःशब्द तपस्या, ध्यान जगाती सत्य का फेरा,
मौन में शक्ति, मौन भक्ति, मौन में ही जग का बसेरा।
– कौशल
पत्थर
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