कलम संगिनी

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शुभ कामना संदेश (काव्य संग्रह “वतन से प्यार जो करते” के लिये

adi.s.mishra

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शुभ कामना संदेश (काव्य संग्रह “वतन से प्यार जो करते” के लिये

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शुभ कामना संदेश (काव्य संग्रह “वतन से प्यार जो करते” के लिये
*शुभकामना संदेश* (काव्य-संग्रह “वतन से प्यार जो करते” के लिये) कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं होती, वह मनुष्य के भीतर धड़कते जीवन का संवेदनात्मक उद्घाटन होती है। जब कोई कवि अपने हृदय की गहराइयों से अनुभवों को रूप देता है, तब उसकी रचनाएँ समाज के अंतर्मन को स्पर्श करती हैं। डॉ. कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’ का कविता-संग्रह “वतन से प्यार जो करते” इसी संवेदना का सजीव प्रमाण है। इस संग्रह की प्रत्येक कविता में मातृभूमि के प्रति अटूट निष्ठा, जीवन के प्रति गहन आस्था और मानवता के प्रति अडिग विश्वास की अनुगूंज सुनाई देती है। देशभक्ति जब काव्य का रूप लेती है, तब वह केवल राष्ट्रप्रेम का गीत नहीं रह जाती, बल्कि वह व्यक्ति को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करने वाली शक्ति बन जाती है। ‘आदित्य’ जी की कविताएँ इसी आत्ममंथन की यात्रा हैं, जहाँ पाठक अपने भीतर झाँकता है और विचार करता है कि “वतन से प्यार” केवल शब्द नहीं, बल्कि एक सतत कर्म, एक जीवंत साधना है। इस संग्रह में विविध विषयों का समावेश है—आध्यात्मिकता, सरल जीवन, नैतिकता, समाज सुधार, राजनीति, विज्ञान और तकनीक के प्रभाव, तथा मानवीय रिश्तों की नाजुकता—सभी पहलुओं को कवि ने अपनी अनुभूति के आलोक में प्रस्तुत किया है। “सादा जीवन ही जीना है”, “ईश्वर की महिमा का माहात्म्य” और “आगे कुआँ है तो पीछे खाई है” जैसी कविताएँ जीवन की सादगी, आत्मविश्लेषण और संतुलन की प्रेरणा देती हैं। वहीं “न खाऊँगा, न किसी को खाने दूँगा”, “चुनाव पहले पाँच साल में होते थे” या “गरीब तो और गरीब होते चले गए” जैसी रचनाएँ समाज की विडंबनाओं और राजनीतिक यथार्थ पर मार्मिक टिप्पणी प्रस्तुत करती हैं। ‘आदित्य’ जी का काव्य केवल विचार नहीं, भाव का भी प्रवाह है। जहाँ एक ओर “भूल जाऊँ मैं, तुझे भी गवारा नहीं” जैसी रचना प्रेम की कोमलता का चित्र खींचती है, वहीं “सर्जि‍कल स्ट्राइक की ज़रूरत है” जैसी कविता देश की सुरक्षा और सैनिकों के साहस का प्रतीक बन जाती है। इसी विरोधाभास में ‘आदित्य’ जी की सर्जना का सौंदर्य है — जहाँ प्रेम और पराक्रम, करुणा और कठोरता, दोनों साथ-साथ चलते हैं। भाषा के स्तर पर कवि ने अत्यंत सहज, प्रवाहपूर्ण और स्वाभाविक शैली अपनाई है। उनकी पंक्तियाँ सीधी दिल में उतरती हैं, उनमें कोई बनावट नहीं, कोई कृत्रिमता नहीं। यह उनकी ईमानदारी और अनुभव का परिणाम है। शब्दों की सरलता में ही उनकी गहराई छिपी है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि यह संग्रह हमारे समय के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। जब समाज भौतिकता की दौड़ में संवेदना खोने लगा है, तब ऐसी कविताएँ हमें ठहर कर सोचने का अवसर देती हैं। वे याद दिलाती हैं कि सच्चा विकास केवल आर्थिक समृद्धि में नहीं, बल्कि नैतिक ऊँचाई और आत्मिक जागरूकता में निहित है। डॉ. मिश्र का यह काव्य-संग्रह न केवल पाठकों को प्रेरित करेगा, बल्कि नई पीढ़ी के लिए भी एक दिशा देगा — कि लेखनी का उद्देश्य केवल शब्दों की सुंदरता नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व भी है। “वतन से प्यार जो करते” में राष्ट्र का गौरव, संस्कृति की गंध और मानवीयता की आत्मा एक साथ साँस लेती है। यह संग्रह केवल कविताओं का नहीं, बल्कि विचारों और भावनाओं के एक विराट कैनवास का चित्रण है। इसमें भारत की मिट्टी की सुगंध है, उसके सैनिकों का साहस है, उसकी माताओं का आशीर्वाद है और उसके कवियों की संवेदना है। मैं डॉ. कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’ को इस उत्कृष्ट कृति के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ। उनकी लेखनी यूँ ही राष्ट्रप्रेम, सत्य और मानवता की मशाल जलाती रहे — यही मेरी शुभकामना है। साथ ही Austa Publication के साथियों को भी बधाई, जो ऐसी सार्थक रचनाओं को पाठकों तक पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं। यह न केवल साहित्य के प्रति समर्पण है, बल्कि सांस्कृतिक चेतना के संरक्षण का कार्य भी है। मेरी यही कामना है कि यह पुस्तक पाठकों के मन में देशभक्ति की नई ज्योति जलाए, जीवन में नैतिकता और मानवीयता के नए संकल्प भरे, और कविता के माध्यम से समाज में संवेदना का नवप्रकाश फैलाए। हार्दिक शुभकामनाएँ और अभिनंदन। - प्रो. (डॉ.) संजय द्विवेदी (पूर्व महानिदेशक) भारतीय जन संचार संस्थान नई दिल्ली

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