कलम संगिनी

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मां की ममता

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मां की ममता
मां की ममता माँ तेरे आँचल में छिप जाऊँ मैं, तेरी ममता की छाँव में मुस्काऊँ मैं। दुनिया की धूप जब मुझको सताती है, तेरी गोद में हर दर्द भुल जाऊं मैं। तेरी यादों में सुकून सा मिलता है, हर आँसू भी मोती सा खिलता है। माँ, तू साथ गर होती तो डर कैसा फिर, तेरे प्यार से ही रोशन हो जाऊं मैं । तेरे यादों की खुशबू से महके मेरा जहाँ, तेरी दुआओं से आसान लगे हर इम्तिहाँ। जब भी गिरूँ मैं राहों में थककर कहीं, माँ, तेरी हिम्मत ही फिर से संभाल ले मुझे वहीं। छोड़कर यूँ चली गई जैसे धूप छांव, कैसे जिएं मां तुम बिन ,ममता की नहीं है कोई ठाव।।। स्वरचित रचना प्रतिभा दिनेश कर विकासखण्ड सरायपाली

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