कलम संगिनी

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कविता देती है रसधार

adi.s.mishra

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कविता देती है रसधार

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कविता देती है रसधार
कविता देती है रसधार मैं नही वियोगी कभी रहा, पर कविताएँ लिखता था, कभी विरह में नही जला, पर गीत, ग़ज़ल रचता था। कल्पना मेरी, लेखनी मेरी, इस मन-मानस के साथी हैं, सोच- समझ की स्वरमाला, अच्छरमाला बन जाती है । शब्दों का चयन, वाग़दा का वर, नव स्वर सरगम बन जाते हैं, कुछ नव स्वर हों, नव गीत रचूँ, नव ताल लिये लय लाते हैं। आदि कवि से स्वर लेकर, सारे कवि कविता लिख पाये। कवि सूर सूर्य, तुलसी शशि, कवि केशव उड़ुगन कहलाये। काव्यों-महाकाव्यों की रचना, प्रतिभूति-न्यास वांग़मय के। वेद, उपनिषद, पुराण, संहिता, बृहद कोष समृद्ध संस्कृति के। रामायण, महाभारत, गीता ज्ञान गंगा की गहरी धार। गोते गहरे लगा लगा कर, मानव करते जीवन पार । काव्य-कौमुदी है बैतरणी, पुण्य प्रतापी है सलिला । सारे तीर्थों का यश लेकर, उतरें पार पुरुष व महिला । काम, क्रोध, मद, लोभ छोड़, सुख- शान्ती ऐश्वर्य मिले । कवि की कविता कहती है, विद्या पाकर विनय मिले । गीतों में रोमांस भरा हो, ग़ज़लों में दिखती तकरार । चल-चित्रों में नायक गाकर, अभिनेत्री से करता प्यार । विरह, वियोग, योग कविता के होते हैं अनुपम आधार । आदित्य कल्पना ही कवि की, कविता में देती रसधार । डा. कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’ लखनऊ

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