कलम संगिनी

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सहिष्णुता- सहनशीलता

adi.s.mishra

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सहिष्णुता- सहनशीलता

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सहिष्णुता- सहनशीलता
*सहिष्णुता* सहिष्णुता का अर्थ है दूसरों के विचारों, विश्वासों, प्रथाओं, धर्मों और जीवन-शैलियों के प्रति सम्मान और उदारता दिखाना, भले ही वे अपने विचारों से भिन्न हों, और बिना किसी आक्रामकता के उन्हें स्वीकार करना, जिससे शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और लोकतांत्रिक समाज का निर्माण हो सके। सिर्फ 'सहन करना' ही सहिष्णुता नहीं होती है, बल्कि 'सुनना, समझना और सम्मान देना' भी सहिष्णुता है, जो धैर्य, विवेक और परानुभूति से प्राप्त होती है। भिन्नता का सम्मान अर्थात् यह स्वीकार करना कि दूसरों के विचार, संस्कृति, धर्म और जीवनशैली अलग हो सकती है, और उन्हें स्वीकार करना महत्वपूर्ण होता है। सहिष्णु होने के लिए अहिंसा और शांति आवश्यक होते हैं। किसी भी प्रकार की आक्रामकता या द्वेष से बचना और शांति बनाए रखना जरूरी होता है। सहिष्णु होने के लिए आवश्यक है दूसरों के विचारों को धैर्य से सुनना और यह मानना कि दूसरे भी सही हो सकते हैं, और स्वयं का ज्ञान अधूरा हो सकता है। उदारता और दया भी सहिष्णुता के महत्वपूर्ण पहलू हैं, दूसरों के प्रति उदार और दयालु दृष्टिकोण रखनाआवश्यक होता है। लोकतांत्रिक समाज में सहिष्णुता ही समाज और राजनीति को लोकतांत्रिक बनाती है, क्योंकि इसमें विरोधी विचारों को सुना जाता है।दूसरों को सुनने के गुण से नए और मौलिक विचार मिलते हैं जो समाज को बदल सकते हैं। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व बनाये रखने के लिये विभिन्न धर्मों, नस्लों और समूहों वाले समाजों में शांति बनाए रखना आवश्यक है। सहिष्णुता हमें रूढ़िवादी सोच से निकालकर अधिक समझदार बनाती है। जैसे एक धार्मिक देश में अन्य धर्मों के लोगों को रहने की अनुमति देना और किसी भी तनावपूर्ण स्थिति में संयम बरतना और बात को बढ़ने न देना। निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है कि सहिष्णुता एक गुण है जो हमें मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बिठाने और एक समावेशी दुनिया बनाने में मदद करता है। विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’ लखनऊ:18 जनवरी 2026 स्वलिखित/ मौलिक

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