कलम संगिनी

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ये कैसा सवाल है

adi.s.mishra

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ये कैसा सवाल है

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ये कैसा सवाल है
तुम्हें मेरी याद आती है? मेरी बिटिया अक्सर मुझसे यही पूछती है… और मैं मुस्कुराकर कहती हूँ— “नहीं… क्योंकि मैं तुम्हें कभी भूलती ही नहीं, जो याद करूँ।” मैं भी कभी-कभी यही सवाल अपने बेटे से पूछ लेती हूँ— “तुम्हें मेरी याद आती है?” और वो हँसकर कहता है नहीं और साथ में जोड़ता है “ये कैसा सवाल है!” शायद हर का अपना-अपना जवाब होता है… और अपना-अपना तरीका भी। पर हाल ही में, एक जन्मदिन की पार्टी में कुछ ऐसा हुआ कि दिल अचानक भर आया… चारों तरफ छोटे-छोटे बच्चे, अपने मम्मी-पापा के इर्द-गिर्द चक्कर लगाते, हँसते, मचलते… और उसी भीड़ में मुझे अपने बच्चों का बचपन साफ दिखाई देने लगा। याद आया—कैसे मैं अपनी बिटिया को सिर से पाँव तक सजा देती थी… बालों की क्लिप से लेकर सैंडिल तक सब कुछ मैचिंग… और वो किसी ना किसी बच्चे को दोस्त बनाकर घुलमिल जाती थी, जैसे वही उसकी दुनिया हो। और मेरा बेटा… वो तो बस चुपचाप मेरे पास बैठा रहता था… उसकी छोटी-सी दुनिया में बस “माँ” और “बहन” ही थे… बाकी दुनिया से जैसे उसे कोई मतलब ही नहीं। कल उन नन्हे बच्चों को सँभालते माँ-बाप को देख, अपने बच्चों का पूरा बचपन आँखों के सामने घूम गया… वो दिन भी क्या दिन थे— जब न सोने का समय तय था, न जागने का… पूरी ज़िंदगी बस बच्चों के हिसाब से चलती थी। छोटे बच्चे भी कितने शरारती होते हैं— गोद में सुलाओ तो फरिश्ते जैसे सोए रहें… और जैसे ही बिस्तर पर रखो, लगता है उनकी नींद पूरी हो गई… और शुरू हो जाता है उनका खेल! और आपके सारे “थोड़ी देर सो लूँ” वाले सपने… बस, वहीं खत्म। पर सच कहूँ—उस थकान में भी एक अजीब-सी खुशी थी… हर दिन एक नया अनुभव, एक नई सीख। कभी बच्चा सोते-सोते मुस्कुरा दे—तो सोचो, क्या सपना देख हँस रहा है… और अगर किसी कारण से रोता ही जाए—तो दिल घबरा जाता था, क्या हुआ, क्यों हुआ… कैसे ठीक होगा… दूध न पिए, या समय से मल मूत्र न करे—तो चिंता और बढ़ जाती थी… और अगर हल्का-सा बुखार भी आ जाए— तो सारे देवी-देवताओं को एक साथ याद कर लिया जाता था । इतनी प्रार्थनाओं और ममता से बच्चों को बड़ा किया है… तो भला उन्हें “भूल” कैसे सकते हैं? और जब कभी भूले ही नहीं… तो फिर ये सवाल ही कहाँ रह जाता है— “तुम्हें मेरी याद आती है?” ❤️ डॉ रंजना द्विवेदी, विद्यावाचस्पति, लखनऊ

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