कलम संगिनी

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मायका का आँगन बुलाता है

मायका का आँगन बुलाता है

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मायका का आँगन बुलाता है
***मायका का आँगन बुलाता है*** मां तेरी यादों का अब हमको सहारा है तेरी ममता की छांव में हमने जीवन गुजारा है आँगन बुला रहा, पर माँ, नहीं अब वहाँ, गली-गली राहों में, तेरी यादें सदा है वहाँ। दीवारों पर बाकी है, तेरी हँसी की छाँव, हर कोना पुकारे माँ — “बस लौट आ, एक ठाँव।” तू बसी हर साँस में है तेरी ममता ने जीवन दिया स्मृतियों के दीप जले, हर शाम तेरे द्वारे तेरे आँचल की खुशबू,महके घर सारे हवा में तेरी बातें, अब भी ,गूँजती हैं, हर कोना तेरे स्नेह से, महक उठती है। तेरे बिना सूना, ये घर और द्वार, तेरी ममता से ही मिलता हमको सारा संसार। दीवारों पर तेरी, तस्वीर मुस्कुराए अब लौट आ न मां अपने घर द्वारे तेरी यादों से ही अब घर लगता है घर, तू ही थी जीवन की, सबसे बड़ी डगर। मां, तेरे चरणों में हम शीश झुकाते हैं तेरे बिना भी हम , तेरे साये को पाते हैं । मां तेरी यादों का अब हमको सहारा है तेरी ममता की छांव में हमने जीवन गुजारा है। स्वरचित गीत प्रतिभा दिनेश कर विकासखंड सरायपाली जिला महासमुंद छत्तीसगढ़

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