कलम संगिनी

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मेरी रचना: मेरी कविता

adi.s.mishra

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मेरी रचना: मेरी कविता

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मेरी रचना: मेरी कविता
*ईश्वर यत्र, तत्र, सर्वत्र विद्यमान है* इस प्रश्न पर आज विचार करें कि कैसे प्रमाणित हो कि ईश्वर होता है, बहुत चिंता की बात है कि ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह किया जा रहा है ! यह सुनकर एक ज्ञानी पुरुष बहुत चिंतित थे, यह देख उनकी पुत्री ने पिता से चिंता का कारण पूछा, पिता ने पुत्री को चिंता का कारण बताया। विदुषी पुत्री ने कहा, कल मुझे राज सभा में ले चलें, मैं सबके के सामने अवश्य सिद्ध करूँगी ईश्वर होता है हम में तुम में कण कण में होता है। अगले दिन राज सभा में विदुषी ने कहा यह सिद्ध करने के लिये उसे एक पात्र में दूध दिया जाय, तुरंत एक पात्र में दूध प्रस्तुत किया गया। विदुषी ने पूछा आप सबको इस पात्र में दूध दिखाई दे रहा है, सबने हाँ कहा, विदुषी ने पूछा दूध के अलावा क्या देख रहे हैं, और कुछ नहीं, सबने कहा। विदुषी ने कहा, पर मुझे तो इसमें मक्खन भी दिखाई दे रहा है क्या आपको नहीं दिख रहा है ? इस पर सभी सभासद व राजा भी चुप रहा। विदुषी ने फिर कहा बताइए आप सब इस दूध में मक्खन है या नहीं सभी ने स्वीकार किया,हाँ है मक्खन, राजा और सभासद अवाक रह गए। विदुषी ने कहा, जिस प्रकार दूध के कण कण में मक्खन है परंतु बिना उसे मथे मक्खन व मक्खन में घी किसी को नहीं दिखता है। उसी प्रकार बिना कठोर उपासना के मूर्तियों में भगवान दिखाई नहीं देता है, जैसे दूध में मक्खन व मक्खन में घी मौजूद है वैसे ही कण कण में ईश्वर है। राजा ने माना कि ईश्वर है, पर वह दुनिया को कैसे देखता व संभालता है, विदुषी ने कहा कि इसके लिए मुझे एक जलती हुई मोम बत्ती चाहिये। उसने कहा जिस तरह मोमबत्ती की रोशनी चारों तरफ़ देखती है और प्रकाश देती है उसी प्रकार ईश्वर सब कुछ देखता है व सम्भालता है । इस पर राजा ने कहा कि ईश्वर सब कुछ देखता व सम्भालता है, तो यह बताओ कि इस समय में ईश्वर स्वयं क्या काम कर रहा है। विदुषी बोली कि राजन इस समय आप मुझसे प्रश्नों का निवारण चाहते है तो मैं आपकी गुरु हूँ और आप निश्चय ही मेरे शिष्य जैसे हैं । पर आप उच्च आसन पर बैठे हैं, मैं आपके सामने खड़ी हूँ, यह उचित है, राजा ने कहा नहीं, तुम्हें मेरे आसन पर और मुझे नीचे खड़ा होना चाहिए। इतना कह कर राजा स्वयं आसन छोड़कर विदुषी को सिंहासन पर बैठने के लिए कहा और वह स्वयं उसकी जगह पर जा खड़ा हो गया । सिंहासन पर बैठ कर विदुषी बोली ईश्वर इस समय यही करवा रहा है, राजा होते हुए आप एक साधारण बालिका के सामने शिष्य बन खड़े हैं। और वह बालिका आपके गुरु की तरह आपके सिंहासन पर बैठकर आपका ज्ञान वर्धन कर आपके प्रश्नों का निराकरण कर रही है । आदित्य राजा व सभी ने माना कि ईश्वर कण कण में विद्यमान है और मंदिरों की मूर्तियों के रूप में ही नही बल्कि यत्र, तत्र और सर्वत्र मौजूद है। विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र, ‘आदित्य’ लखनऊ

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