पहला रुद्र ज्वाला समाना,
त्रिलोक जलाए क्रोध दिवाना।
नेत्रों में है अग्नि की धारा,
नृत्य करे वह प्रलय हमारा।
दूसरा रुद्र तप का सागर,
हिमगिरी जैसा शीतल भाव।
मौन में जो ब्रह्म को धारे,
जग को सत्य पथ पर वारे।
तीसरा रुद्र दया का दरिया,
करुणा से करे अघ का हरण।
भक्तों के हित जीवन देवे,
हर रूप में शिव ही पहरे।
चौथा रुद्र युद्ध का योद्धा,
असुरों पर वह वज्र समान।
त्रिशूलधारी, रुण्डमालधर,
अधर्म पे करे संहार महान।
पांचवां रुद्र आत्मा का दीपक,
ज्ञान-ज्योति से करे उजियारा।
भीतर बैठे चैतन्य स्वामी,
जग को देवे आत्मा का सहारा।
रुद्र न केवल संहार करता,
वह सृजन का मूल है गहरा।
पंच रूपों में वह विस्तारित,
शिव ही शिव है, जीवन सारा।
पंच महा रुद्र...
पंच महा रुद्र...
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