कलम संगिनी

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परसा के फूल

HARNARAYAN KURREY

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1 Followers 93 Posts Oct 2025

परसा के फूल

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परसा के फूल
विषय - परसा के फूल छत्तीसगढ़ी कविता – मौलिक रचना परसा के फूल फूले हे, रंग-रंग के बहार, डहर-डहर महके हे, जंगल के सिंगार। लाल-पीयर अँचरा जइसे, हँसे गाछ के डार, भँवरा गुनगुन करथे, लेके मया के सार। बिरछा के छइंहा मं, सुग्घर लागे गाँव, परसा फूले देख के, नाचे मन के पाँव। फूल झरे जब धरा मं, बिछ जाथे गुलाल, माटी संग अपनापन, लागे एकदम कमाल। परसा के फूल कहिथे— सादा रहिबे भाई, प्रकृति के मया बिन, जिनगी नई हो पाई। गरमी के दिन मं जब, सूरज देथे ताप, परसा के छइंहा मं, मिट जाथे संताप। चिरई-चिरगुन गाथें, डार-डार मं तान, फूलन संग गूंजे, जंगल के मुसकान। गाँव के लइका मन, खेले हँस-हँस जाय, परसा नीचे हर दुख, खुदे दूर हो जाय। पर्व-त्योहार मं फूल, पूजा मं चढ़ जाथे, परसा बिन हर रस्म, अधूरी लग जाथे। बइठकी मं जब बुजुर्ग, कहिनी कहे रात, परसा के हवा संग, मीठ लागे बात। मोर-पपीहा बोलथे, बिहान के पहर मं, परसा संग जंगल, जागे नवा सहर मं। फूलन के सुगंध लेके, चलथे मंद बयार, मन के भीतर जागे, सुकून के उजियार। बरखा जब बरस जाथे, धुल जाथे धूर, परसा के डार मं, चमके नवा नूर। हिरदा मं मया जागे, गुस्सा हो जाथे कम, परसा के रंग देख, मुसकाथे हर जन। जंगल के ये धन ला, हम सब बचाबो आज, परसा रहिही हरियर, तभे बांचे समाज। रचनाकार कौशल

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