स्वरचित मौलिक कविता
शीर्षक -प्रेम/मोहब्बत
"प्रेम तेरा हो या मेरा,
बस रूह का होना चाहिए।
वो झरना मोहब्बत का ,
हम पर बरसना चाहिए।
इश्क़ इबादत है पूजा की तरह,
जहां रोली कुमकुम सब एक रंग।
हर अंग में महफूज़ रहें,
नाम तेरा हर संग।
मोहब्बत नूर है मेरा,
श्रृंगार तेरी प्रीत है।
हल्की हंसी होंठों पर,
मानो बहारों में फूल खिले।
तु देखना तेरी चाहत में,
मैं रंगहीन से रंगीन हो गया।
प्रेम की लगी लगन ऐसी,
मैं दीवाना हो गया।
प्रेम वो भाव है जिसको,
कह नहीं जा सकता।
सिर्फ में रूह में उतरा जाता है,
और हवाओं में महसूस होता है।
प्रेम तेरा हो या मेरा,
बस रूह का होना चाहिए।
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