कलम संगिनी

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विश्व महिला समानता दिवस विशेष

adi.s.mishra

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विश्व महिला समानता दिवस विशेष

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विश्व महिला समानता दिवस विशेष
*विश्व महिला समानता दिवस पर विशेष* *स्त्री शिक्षा, समानता व महिला जागरूकता* जहाँ स्त्री शिक्षा और समानता की बात आती है तो स्त्री शिक्षा पर बात करना ज़रूरी हो जाता है। मेरे विचार से यह महिला समानता और शिक्षा का विषय होते हुये भी इस पर प्रथक तरीके से विचार होना चाहिये। अब्राहम लिन्कन के शब्दों में "तुम मुझे योग्य माँये दो, मैं तुम्हें योग्य राष्ट्र दूँगा"। स्त्री समानता और शिक्षा वस्तुत : सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली का मूल आधार है। स्त्री शिक्षा और समानता की हवा चली तो परिवर्तन आ रहा है, पर इसके साथ एक तरफ चूल्हा - चौका की मानसिकता घिरी रहती है तो दूसरी तरफ शिक्षित होते हुये भी उच्च पदों पर बैठे पतियों की पत्नियाँ क्लबो, पार्टियों -ताश खेलने व शापिंग और घूमने फिरने में जीवन व्यतीत कर रही, वे बोर होने की शिकायत भी करती हैं पर उनके बच्चों का पालन - पोषण नौकर करते हैं। जबकि उनका उत्तरदायित्व है बच्चों को अच्छे संस्कार दें और समाज के विकास में योगदान दें। आज भी "यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता" की मान्यता वाले हमारे देश भारत में समुचित शिक्षा के अभाव में भी स्त्रियों को उनका उचित स्थान नहीं मिल पाया है। आज तो अब "स्त्री स्वातन्त्र्य" की बातें कोरे नारे लगने लगी हैं। आज महिला यूँ तो कहाँ से कहाँ पहुँच गयी है, किंतु स्त्री स्वाधीन पहले भी नहीं थी, स्वाधीन वह अब भी नहीं है। वह तो स्वाधीन होने का कभी - कभी तो दिखावा कर स्वतंत्र होने की खुशफहमी पाल लेती है, परंतु पुरुषत्वी अहं न कभी खत्म हुआ था, न खत्म हुआ है और न शायद कभी खत्म होगा! बस चोले ज़रूर बदल लेता है। नारी स्वतंत्रता और समानता की दुहाई देने वाला पुरुष भी स्त्री की पूर्ण स्वतंत्रता और बराबरी का अधिकार नहीं बर्दाश्त कर पाता, यह एक कटु सत्य है, चाहे कोई माने या न माने। जबकि माना गया है कि "Men are what their Mothers made them". यदि इस सिद्धांत को सही तरीक़े से अपनाया जाय तो स्त्री शिक्षा की सार्थकता भी बढ़ेगी और नयी पीढ़ी व नये समाज का समुचित विकास भी सम्भव होगा। तात्पर्य यह है कि स्त्री शिक्षा व महिलाओं के समुचित विकास में ही देश व समाज का पूर्ण विकास हो पाना सम्भव है। इसलिये समाज, देश और समस्त विश्व को इस दिशा में निरंतर प्रयास करने की महती आवश्यकता है ताकि सही मायनों में महिलाओं को समानता का अधिकार मिल सके और वे परिवार, समाज तथा देश और विश्व के विकास में अपना बराबर का योगदान दे सकें। डा. कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’ लखनऊ:

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