*जीवन दर्शन और सुख-दुःख*
सुख-दुःख का होना जीवन,
में एक सरस एहसास बना,
सुख आता है दुःख जाता है,
ये क्रम ही अविरल आस बना।
जब जीवन का हो उषा काल,
सुख की धारा बह चलती है,
जब जीवन की साँझ ढले,
दुःख का आलिंगन करती है।
जब मिलन हृदय से गाता है,
सुख की होती अनुभूति तभी,
विरह रुलाता सब जग को, दुःख की होती परतीति तभी।
दुःख सुख का आना जाना,
निशि वासर के क्रम जैसा है,
उगते सूरज चन्दा क्रम से,
अस्ताचल क्रम भी वैसा है।
सुख दुःख माया के कारण हैं,
हम सबके जीवन में आते हैं।
माया रूपी भ्रम जाल धरा पर,
सांसारिक जीवन दर्शाते हैं।
माया भ्रम के झँझावात यही,
मानव मन की फसल उगाते हैं,
प्रेम, घृणा, आशा, ईर्ष्या सब,
बदले का भाव दिखलाते हैं।
सुख आने पर ना हो अतिरेक ख़ुशी,
दुःख आने पर विचलित मत होना।
‘आदित्य’ संतुलन हर स्थिति में,
जीवन में स्थिति प्रज्ञ बने रहना।
डा. कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
लखनऊ
जीवन दर्शन
जीवन दर्शन
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