कलम संगिनी

कलम संगिनी

कृकल उपप्राण (स्वरचित कहानी)

कृकल उपप्राण (स्वरचित कहानी)

85 Views
0 Likes 0 Comments
1 Saves
0 Shares
कृकल उपप्राण (स्वरचित कहानी)
*कृकल उपप्राण* (स्वरचित कहानी) हिमालय की शांत वादियों में *ऋषिकुंड* नाम का एक सुंदर गाँव बसा था। यह गाँव अपने हरे-भरे खेतों, झरनों की मधुर ध्वनि और सादगी भरे लोगों के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। गाँव के मध्य में एक पुराने आश्रम में वृद्ध *वैद्य अच्युतानंद जी* रहते थे। वे केवल औषधियों के ज्ञाता ही नहीं, बल्कि प्राण-तत्वों के गहरे मर्मज्ञ थे। गाँव के लोग उन्हें प्रेम से *“प्राणों के रक्षक”* कहते थे। उनके आश्रम के सामने पाँच रंगों के झंडे सदैव हवा में लहराते रहते। बच्चे अक्सर उत्सुकता से पूछते— “गुरुदेव, ये पाँच झंडे क्यों हैं?” अच्युतानंद जी मुस्कराकर समझाते—“ये हमारे भीतर के पाँच उपप्राणों— नाग, कूर्म, *कृकल*, देवदत्त और धनंजय के प्रतीक हैं। यही हमें जीवित रखते हैं और हर क्षण हमारी रक्षा करते हैं।” गाँव का परिश्रमी युवक माधव जब भी अपने खेतों में जाता, तो सुबह-शाम, आते-जाते थोड़ी देर के लिए वैद्य अच्युतानंद जी के पास बैठ जाता। वैद्य जी उसे हिन्दी साहित्य और आश्रम में लगे पांच झंडो के विविध ज्ञान से समृद्ध करते थे। एक दिन बहुत देर हो चुकी थी और माधव उस दिन आश्रम नहीं आया। वैद्य जी थोड़ा चिंतित हुए और धीरे-धीरे माधव के खेतों की ओर बढ़े। वहाँ उन्होंने देखा कि माधव लेटा-लेटा कराह रहा है। वैद्य अच्युतानंद जी ने पूछा—“माधव, क्या हो गया? तबियत तो ठीक है ना?” माधव बोला—“गुरुदेव, आज सुबह से ही मेरे सीने में जलन और उल्टी जैसी पीड़ा हो रही है, पर अभी-अभी कुछ ज्यादा हो गई है। पहले मैंने इसे साधारण थकान समझकर अनदेखा किया, लेकिन खेत में काम करते-करते मुझे चक्कर आ गया।” इतना कहते ही माधव आगे कुछ बोल नहीं पाया, उसका चेहरा पीला पड़ गया और माथे पर पसीना छलक आया। वैद्य जी ने उसे जंगली जड़ी-बूटियाँ दी और थोड़ी देर बाद माधव कुछ होश में आ गया। तब अच्युतानंद जी ने ध्यानपूर्वक उसकी नाड़ी देखी, कुछ क्षण मौन रहे, फिर शांत स्वर में बोले—“माधव, तुम्हारा शरीर *कृकल उपप्राण* का संदेश दे रहा है। जानते हो यह क्या है?” माधव ने सिर हिलाते हुए कहा—“नहीं गुरुदेव।” अच्युतानंद जी उसे धीरे-धीरे पास के तालाब तक ले गए। तालाब का जल बिल्कुल शांत था। उन्होंने एक कंकड़ पानी में डाला, तो गोल-गोल लहरें उठीं। वैद्य जी ने माधव की ओर देखते हुए कहा— “देखो माधव, यह तालाब पहले कितना शांत था। जैसे ही कंकड़ पड़ा, तुरंत प्रतिक्रिया हुई। हमारा शरीर भी ऐसा ही है कि यदि हम गलत भोजन करें, तनाव में रहते हैं या कोई विष ग्रहण कर लें, तो यह *कृकल उपप्राण* के रूप में प्रतिक्रिया करता है।” वैद्य जी ने इस प्रकार समझाया— *डकार-वमन की चेतना, कृकल दूत कहाय।* *असुविधा-रूपे आए जो, विष-संकट हरि जाए॥* (अर्थात जब शरीर में कोई हानिकारक तत्व पहुँचता है, तो *कृकल उपप्राण* सक्रिय होकर उसे बाहर निकालता है। यह असुविधा वास्तव में हमारे लिए सुरक्षा का संदेश है।) अच्युतानंद जी बोले— “मैं तुम्हें एक दूसरी कहानी सुनाता हूँ, ध्यान से सुनो। बहुत समय पहले की बात है, एक राजा ने गलती से विष पी लिया था, पर उसका जीवन बच गया क्योंकि *कृकल उपप्राण* सक्रिय हो गया। उसने तीव्र उल्टी कर दी और विष बाहर निकल गया। यदि कृकल सक्रिय नहीं हो पाता, तो वह राजा नहीं बच पाता। समझो माधव, *कृकल उपप्राण* केवल असुविधा नहीं, यह तो हमारे भीतर का मौन प्रहरी है।” माधव ने ध्यानपूर्वक सुना और उसके मन में यह बात उतर गई कि शरीर की हर छोटी-बड़ी प्रतिक्रिया का कोई उद्देश्य होता है। यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि चेतावनी और सुरक्षा का संकेत है। अच्युतानंद जी ने उसका कंधा थपथपाया और स्नेहपूर्वक कहा— “माधव, भोजन हल्का और सात्विक करो। क्रोध या चिंता में कभी मत खाओ। भोजन के बाद गहरी साँसें लो, प्राणायाम करो। पानी सही समय पर पियो और शरीर को पर्याप्त विश्राम दो। ऐसा करोगे तो *कृकल उपप्राण* सदैव तुम्हारी रक्षा करेगा।” माधव ने वैद्य जी की आज्ञा और सुझाव पूरे मन से मान लिए। धीरे-धीरे यह बात पूरे गाँव में फैल गई। जब भी कोई डकार या उल्टी से परेशान होता, गाँव के लोग मुस्कराकर कहते— *“अरे! कृकल उपप्राण ने चेताया है, सावधान हो जाओ!”* यही वाक्य धीरे-धीरे गाँव की कहावत बन गया और सब समझ गए कि शरीर की हर प्रतिक्रिया में प्रकृति का संदेश छिपा है। अच्युतानंद जी ने गाँव के बच्चों को समझाया— *शरीर-संदेशों को सुनो, हर लक्षण का मान।* *कृकल चेतक-प्राण है, रखता हमारी जान॥* (अर्थात अपने शरीर के सभी संदेशों और संकेतों को ध्यान से सुनो। जो भी छोटी-बड़ी असुविधाएँ या लक्षण दिखाई दें, उन्हें हल्के में मत लो। *कृकल उपप्राण* हमारे शरीर का चेतक है, जो हमारी सुरक्षा करता है और हमें जीवन के खतरे से बचाता है।) अब ऋषिकुंड गाँव के लोग जान गए कि छोटी-छोटी असुविधाएँ भी बड़ी बीमारियों से बचाव का संकेत होती हैं। यदि हम इन संकेतों को समय रहते समझें और अपनी आदतें सुधार लें, तो कई रोग जीवन में आने से पहले ही टल सकते हैं। गाँव के सभी लोग अब अच्युतानंद जी को स्नेहपूर्वक “गुरुदेव” कहकर पुकारने लगे। गाँव में जरा सा भी कोई अस्वस्थता, पीड़ा या असुविधा दिखाई देती, तो लोग समझ जाते कि यह *कृकल उपप्राण* का संदेश है। ऐसे समय में वे तुरंत कहते— गुरुदेव के पास चलो, ताकि उनके मार्गदर्शन और सावधानी से स्वास्थ्य और जीवन की समय पर रक्षा हो। अत: यह कहानी हमें सिखाती है कि *कृकल उपप्राण* हमारे शरीर का मौन प्रहरी है, जो असुविधा के रूप में चेतावनी देता है और हमें जीवन की सुरक्षा के लिए सजग रहने की प्रेरणा देता है। ✍️ योगेश गहतोड़ी "यश" (ज्योतिषाचार्य) मोबाईल: 9810092532 नई दिल्ली -110059

Comments (0)

Click to view
Footer