*बहिष्प्राज्ञ*
(स्वरचित कविता)
जब मन के सागर में उठी ज्ञान की पहली लहर,
जागी बुद्धि और चेतना — जैसे दिन का प्रथम प्रहर।
देखा हमने जग को बाहर, सुनी जीवन की बात,
इंद्रियाँ जब संग चलें, मिले जीवन में नई सौगात।
जब मन रहे शांत और सधा, विवेक करे पहचान,
सत्य-धर्म की राह चले, मिटे मन का भ्रम-जाल।
क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार से जब दूर रहें विचार,
तब बहिष्प्राज्ञ बने साक्षी, जीवन हो जाता साकार।
ज्ञान और अनुभव मिलकर, बुद्धि को देते बल,
हर स्थिति में सच्चाई देखे, मन रहे सदा निर्मल।
जब कर्म करे जो नेकी से, समाज में दे योगदान,
बहिष्प्राज्ञ का यही प्रकाश, जीवन का सम्मान।
जाग्रत चेतना बोले तब — “हे मन, साक्षी बन तू,
देख जग का माया-जाल, भीतर उजियारा भर तू।”
नयन देखें, कान सुनें, हे मानव! न डोले मन तेरा,
बहिष्प्राज्ञ का प्रथम कदम — अद्वैत का सवेरा।
क्षणभंगुर है यह संसार, आत्मा सदा अटल,
सद्गुणों का दीप जलाकर, कर स्वजीवन निर्मल।
सुख-दुःख में भी जो स्थिर रहे, सत्य-पथ अपनाए,
वही चेतन बहिष्प्राज्ञ कहलाए, जीवन सुधर जाए।
बहिष्प्राज्ञ सिखलाता हमको, जागृति का संसार,
ज्ञान, कर्म और सत्य से बनता है जीवन उपहार।
निर्मल बुद्धि, शांत मन से जीवन हो ओत-प्रोत,
पंचप्राज्ञ का प्रथम पाद — जीवन का सच्चा स्रोत।
✍️ योगेश गहतोड़ी "यश"
बहिष्प्राज्ञ (स्वरचित कविता)
बहिष्प्राज्ञ (स्वरचित कविता)
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