शीर्षक – "ठोकरों से सीखना"
कविता
मौलिक रचना
ठोकर खाकर ही इंसान संभलना सीखता है,
गिरकर फिर उठना, खुद को परखना सीखता है।
राहों में जब पत्थर सवाल बन जाते हैं,
तब मन अपना सही रास्ता चुनना सीखता है।
हर ठोकर एक सबक बनकर आती है पास,
टूटे हुए सपनों में भर जाती है विश्वास।
दर्द की भाषा जो समझ लेता है मन,
वही जीवन की गहराई पहचानता खास।
जो ठोकरों से डरकर रुक जाता है राह में,
वो खो जाता है खुद ही अपने चाह में।
सीख जो ले ठोकरों से, वही आगे बढ़ता है,
इतिहास उसी का बनता है हर एक चाह में।
रचनाकार
"कौशल"
09.01.2026
ठोकरों से सीखना
ठोकरों से सीखना
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