रचनाकार - हरनारायण कुर्रे, मुड़पार चु,पो.रसौटा, तहसील पामगढ़, जिला जांजगीर चांपा (छत्तीसगढ़)
शिर्षक -“शीत ऋतु के स्वागत ”
विधा - काव्य
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शीत ऋतु आई है द्वार हमारे...
शीतल-सा उसका धीमा नाद...
ओस की बूँदें चमक उठी हैं,
जैसे चुपके रख दे कोई स्वाद।
खेत खलिहान चाँदी ओढ़े,
धीमे सुर में रचते गान...
नीला नभ मुस्काता ऊपर,
हवा हुई मधुमान।
सूरज भी धुंध में छिपकर,
धीरे-धीरे झाँक रहा...
किरणों की कोमल डोरियाँ
दुनिया को सहला रहीं।
चाय की प्याली में जैसे,
मन का स्नेह उतर आया,
अंगारों-सी गरम यादें भी,
धीमे-धीमे पिघल पाईं...
सुबह-सुबह का कोहरा देखो,
घूँघट-सा फैल गया है...
राहों पर चलती परछाई
कुछ भटकी, कुछ ठहर गई।
सरसों के खेतों में जाकर
धूप हँस देती हल्की-सी,
गरम रजाई के घेरे में
नींद नई-सी छन आई।
गुनगुना पानी छू लेता
थका हुआ हर एक अंग,
सरद सवेरे की निस्तब्धता
साथ चलाती धीमा संग।
शाखों पर ठिठकी गौरैयाँ
धीरे चोंच हिलाती हैं,
बच्चे धूप पकड़ने दौड़े,
चटाई पर खेल रचाते।
रसगुल्ले की मीठी यादें,
गजब की खुशबू के संग,
तिल–मूँगफली वाले लड्डू
भर दें मन में अनोखा रंग ।
अंगीठी के पास सिमटकर
बूढ़ों की बातें चलतीं,
स्मृति की गरम रजाई में
बीते पल आकार बनते।
दीवारों पर कंडा (गोबर)सूखे,
सूरज सुनाए ताप नया,
धुंधली शामें पिघल-पिघलकर
स्नेह जगाएँ स्मरण भया।
हरी सब्ज़ियों से भरे ठेले,
पालक–मेथी के संग-संग,
मिर्च की चटनी की खुशबू
घुलती जाए अंग-अंग।
स्वेटर, शॉल, मफलर लेकर
लोग निकलते घर से...
गली-गली में कुहरे वाली
धीमी-सी सरद सिहरन है।
लंबी रातें चादर ओढ़े
बिल्ली-सी दुबकी रहतीं,
स्मृतियों की लोई में लिपट
धड़कन धीमी बहती।
लोहड़ी, मकर-संक्रान्ति के
गीत उठें मधुर तान में,
तिल–गुड़ की मीठी कथा
जीवन भर दे प्राण में।
आँगन में धूप का टुकड़ा
आ बैठा जैसे मेहमान,
सब मिलकर स्वागत करते—
शीत ऋतु का गान।
हे शीतल ऋतु, स्वागत तेरा,
मन तुझको दे सम्मान,
तन को ताप, मन को आशा,
जीवन को मुस्कान।।
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शीत ऋतु की स्वागत
शीत ऋतु की स्वागत
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