कलम संगिनी

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आदित्यायन शृंखला की आठ पुस्तकों का विमोचन

adi.s.mishra

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आदित्यायन शृंखला की आठ पुस्तकों का विमोचन

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आदित्यायन शृंखला की आठ पुस्तकों का विमोचन
एक अविस्मरणीय दिन – आदित्यायन काव्य-संग्रह का विमोचन 30 अप्रैल 2025, अक्षय तृतीया का शुभ दिन हिंदी संस्थान, लखनऊ में एक ऐसा यादगार दिन रहा, जिसे शब्दों में बांधना आसान नहीं। पापा की साहित्यिक यात्रा के एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर उनके “आदित्यायन काव्य श्रृंखला” की आठ पुस्तकों का एक साथ विमोचन हुआ — यह मेरे लिए गर्व, सम्मान और भावुकता का मिलाजुला एहसास था। कार्यक्रम में ले जरनल पुरी के करकमलों से पुस्तकों का विमोचन होना अपने आप में एक सौभाग्य की बात थी। साथ ही इस अवसर पर काशी विद्यापीठ के प्रतिनिधि, मीडिया बंधु, और सभी इष्ट-मित्र व परिजन भी उपस्थित रहे सबने मिलकर इस क्षण को और भी खास बना दिया। पापा की लेखनी को मैंने वर्षों से घर में चुपचाप बहते देखा है—जैसे किसी शांत नदी की धारा, जो भीतर बहुत कुछ कह जाती है। उनकी कविताएँ सिर्फ कविता नहीं, जीवन की विविध अनुभूतियों का दस्तावेज़ हैं—संवेदनशील, अर्थपूर्ण और आत्मिक। जब वे या कोई और मंच से उनकी ही रचना सुना रहा था, तो उनके हर शब्द के साथ मेरे भीतर गर्व की लहरें उठ रही थीं उन्होंने अपने जीवन के 76वें वर्ष में कैंसर जैसी दुरूह बीमारी के कष्ट को सहते हुए भी लेखन जारी रखा है ये हम सबके लिए एक प्रेरणा है । पापा की कविताएं उनकी सोच, उनके अनुभव और उनके संवेदनशील मन की अभिव्यक्ति हैं। वे हर बात को बड़े सरल ढंग से कहते थे — चाहे जीवन की कठिनाइयाँ हों, समाज की सच्चाई, या फिर मन की गहराइयाँ। उनका लेखन बताता है कि उनके भीतर कुछ है जो शब्द बनना चाहता है। जब जब मैंने उनकी लिखी कविताओं को पढ़ा, तो यह एहसास हुआ कि यह केवल उनके नहीं, हम सबके अनुभव हैं। यह संग्रह उनके विचारों की धरोहर है, यह विमोचन सिर्फ पुस्तकों का नहीं था—यह एक यात्रा का उत्सव था, जिसमें तप, साधना और भावनाओं की गहराई थी। उन्हें मंच पर सम्मानित होते देखना एक ऐसा पल था जिसे शब्दों में पिरोना कठिन है। यह न केवल एक साहित्यिक उपलब्धि है, बल्कि हमारे परिवार के लिए एक अमूल्य स्मृति भी है। अपने पापा के लिए यही कहूँगी कि: आप धूप में तपे, पर हमारी छाँव बन गए, सीमा के प्रहरी, शांति के रक्षक, सेना की वर्दी उतारी तो क्या, कर्म की वर्दी कब उतारी आपने भला? हर दुखती रग को सहलाया आपने, हर मिलने वाले कि उम्मीद बने आप। आपने कलम उठाई तो शब्दों ने जाना, क्या होता है सच को सलीके से गाना। हर कविता में बसी एक गाथा, जीवन की, संघर्ष की, सच्ची परिभाषा। आदित्य हमारे लिए सिर्फ़ एक उपनाम नहीं, एक संकल्प, एक प्रण, एक आशीर्वाद है। आप वो गीत, जिसे हर दिल गाता है, आप वो दीप, जो अंधेरे में राह दिखाता है। मैं आभारी हूँ उन सभी का, जिन्होंने इस पल को विशेष बनाया। इस उपलब्धि को आप सबके साथ साझा करते हुए मन उत्साहित भी है और बहुत भावुक भी। पापा Adi S Mishra आपकी कलम यूँ ही नित नई ऊँचाइयाँ छूती रहे, आपके विचार, आपकी कविताएँ, और आपका सृजन—हम सबके लिए प्रेरणा हैं। डॉ रंजना द्विवेदी, लखनऊ

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