रचना - स्वरचित मौलिक
शीर्षक - "मीरा का प्रेम"
"मीरा के मन में कृष्ण समायें,
मन का बस ये भाव।
हो गई वो तो प्रेम में पागल,
कृष्ण नाम दोहरायें।
प्रियतम की डोरी ऐसी जुड़ी हे,
जैसे जुड़ी हो पतंग।
ज़हर का प्याला हंसकर पीया हे,
वो तो मीरा दीवानी।
पीर पराई ऐसी लागी की,
कृष्ण हरि गुन गावे।
प्रेम का शब्द ये कान्हा दिया है,
मीरा ने गुनगुनाया।
विलीन हो गई प्रेम मार्ग में,
कृष्ण रस मीरा कहलाई।
वैराग्य जीवन मुझे बहुत ही प्यारा,तन मन प्रफुल्लित होये।
मीरा का मन पतित पावन,
सभी रूपों में ऊंचा।
मीरा के मन में कृष्ण समायें,
हो गई वो तो मीरा दीवानी।
मीरा प्रीत पुकार सुनी प्रभु ने,
युग नाम प्रेम कहलाई।
ऐसी प्रेम की दिवानी हुईं,
मीरा बाई कहलाई।
मीरा पा गई कृष्ण रंग को,
अंग अंग,रूह रूह प्रियतम समायें।
लेखिका कवि-नीतू धाकड़ अम्बर नरसिंहगढ़ मध्यप्रदेश
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