शिर्षक - ख़ामोशी
कविता
मौलिक रचना
ख़ामोशी की गोद में दफ़न हैं वो बिखरे हुए अरमानों की राख,
आंसुओं की लहरों में डूबती, एक मुरझाया फूल सी।
हवाओं में काँपती है वो अनसुनी सिसकी,
सीने की अंधेरी कोठरी में बंद, बिना किसी चीख के।
ख़ामोशी फूटकर रोती है जब, पूरी ज़मीन काँप उठती है,
और रूह को लगता है वो घाव, जो हर सांस में दहकता रहता है।
रचनाकार
कौशल
छत्तीसगढ़
29.01.2026
ख़ामोशी
ख़ामोशी
Please log in to post a comment.
No comments yet
Be the first to share your thoughts about this post!