*एक स्वप्न जो मैंने देखा*
*जीवन बस एक यात्रा है*
शायद हम ये भूल जाते हैं कि वृद्धावस्था आते आते एक उम्र के बाद दांत गिर जाते हैं, हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और ज़बान भी लड़खड़ाने लगती है। इस शरीर का क्या भरोसा और 75 - 77 की उम्र के बाद तो कोई पूछता भी नहीं। पर हमें शायद चिंता अपनी नहीं, बल्कि अपनो की होती है जिसकी वजह होती है इस संसार की दुनिया दारी व माया मोह।
आइये मेरा एक स्वप्न जो संदेश देता है उसको पढ़ें और समझें:
मैंने एक रात स्वप्न में देखा कि मेरी मृत्यु हो चुकी है और जब मुझे इसका एहसास हुआ तो देखता हूँ कि भगवान हाथ में एक बड़ा थैला लिए मेरी तरफ आ रहें हैं और कह रहे हैं:
भगवान: चलो बच्चे वापिस जाने का समय हो चुका है।
मैंने कहा: प्रभू इतनी जल्दी, मेरी तो अभी बहुत सारे काम बाकी हैं! मेरी कई पुस्तकें प्रकाशित होनी हैं जो मैंने काव्य-संग्रह और लेख संग्रह लिखे हैं। जिनके आधार पर मैं पद्म पुरस्कार व अन्य सम्मान/ पुरस्कार प्राप्त कर सकता हूँ।
भगवान बोले- बच्चे मुझे अफ़सोस है, लेकिन अब तुम्हारे वापिस जाने का समय हो चुका है।
तो मैंने पूछा आपके पास उस बड़े थैले में क्या है ?
भगवान् : तुम्हारा सामान।
मैं बोला मेरा सामान ? आपका मतलब मेरी वस्तुएँ, मेरी पुस्तकें, मेरे कपड़े, मेरा धन..?
भगवान्: वो चीजें कभी भी तुम्हारी नहीं थी बल्कि इस पृथ्वी लोक की थी।
मैं बोला तो क्या इसमें मेरी यादें हैं ?
भगवान्: नहीं ! उनका सम्बन्ध तो समय से था।
मैंने पूछा कि क्या इसमें मेरी योग्यता के प्रमाणपत्र, सम्मान पत्र, मेरी मानद उपाधियाँ हैं ?
भगवान् : नहीं ! उनका सम्बन्ध तो परिस्थितियों मात्र से था।
तो मैंने पूछा कि तब क्या मेरे दोस्त और मेरा परिवार ?
भगवान्: नहीं ! उनका सम्बन्ध तो उस रास्ते से था जिस पर तुमने अपनी यात्रा की थी।
मैंने पूछा कि क्या इसमें मेरे सगे-सम्बंधी हैं ?
भगवान्: नहीं, उनका सम्बन्ध तो तुम्हारे मन से था।
मैंने पूछा कि तब तो ये मेरा शरीर होना चाहिए ?
भगवान्: नहीं बिलकुल नहीं ! उसका सम्बन्ध तो पृथ्वी की धूल-मिटटी से था।
मैंने उत्सुक होकर पूछा कि तब जरूर ये मेरी आत्मा होनी चाहिए!
भगवान्: तुम फिर गलत समझ रहे हो बच्चे ! तुम्हारी आत्मा का सम्बन्ध सिर्फ मुझसे है।
आँखों में आँसू भरकर मैंने भगवान के हाथों से थैला ले लिया और उसे डरते डरते देखा जो खाली था।
अत्यंत निराश व दुखी होने के कारण मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।
मैंने भगवान् से पूछा: कि हे भगवान- क्या कभी मेरी अपनी कोई चीज थी ही नहीं ?
भगवान ने कहा बिलकुल! तुम्हारी अपनी कोई चीज नहीं थी।
मैंने कहा प्रभू- तो मेरा अपना था क्या ?
भगवान बोले- तुम्हारे पल, प्रत्येक लम्हा, प्रत्येक क्षण जो तुमने जिया है वही तुम्हारा था।
और तभी मेरी नींद खुल गई, मैंने अपने को जीवित पाया। भगवान कहीं नहीं दिखे और मुझे समझ आया कि यह स्वप्न था।
परन्तु इस स्वप्न का तात्पर्य यह समझ आता है कि
भगवान का इशारा तो यह था कि इंसान जब पैदा होता है तो बंद मुट्ठी लेकर संसार में आता है और जब इस संसार से जाता है तो ख़ाली हाथ ही जाता है संसार की हर चीज़ यहीं छूट जाती है।
इसलिए हम हर पल अच्छा काम करें, हर क्षण अच्छा सोचें। क्योंकि बस यही हमारे साथ जाने वाला है
और इसके साथ ही हर पल ईश्वर का शुक्रिया अदा करते रहें उसकी कृपा, उसकी मेहरबानियों के लिये।
जीवन सिर्फ एक यात्रा है,
इसे पूरी करते हुए इसका आनंद लें, क्या पता कल ये पल मिलें या ना मिलें।
*जो है बस एक वही ईश्वर है, एकोस्मि द्वितीयो नास्ति*।
डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
लखनऊ: 21 अक्टूबर 2025
एक स्वप्न जो मैंने देखा कि जीवन बस एक यात्रा है
एक स्वप्न जो मैंने देखा कि जीवन बस एक यात्रा है
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