कलम संगिनी

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बटेर के अंडे: राष्ट्रनिर्माण की पत्रकारिता

adi.s.mishra

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बटेर के अंडे: राष्ट्रनिर्माण की पत्रकारिता

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बटेर के अंडे: राष्ट्रनिर्माण की पत्रकारिता
*बटेर के अंडे और राष्ट्रनिर्माण की पत्रकारिता* कहते हैं कि ज्ञान ही शक्ति है। परन्तु यह बात उस युग की है जब ज्ञान का अर्थ वेद, विज्ञान, दर्शन या अनुभव हुआ करता था। आज ज्ञान का स्वरूप बदल चुका है। अब ज्ञान वह है जो प्राइम टाइम में ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाए और जिसे सुनकर दर्शक चाय का कप रोककर कहे—"अरे वाह! यह तो हमें पता ही नहीं था!" इसी क्रम में एक दिन एक प्रतिष्ठित चैनल ने राष्ट्र को एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूचना दी—रूस के राष्ट्रपति पुतिन नाश्ते में बटेर के अंडे खाते हैं। देश स्तब्ध रह गया। जिस देश को यह पता नहीं था कि उसके मोहल्ले की सड़क कब बनेगी, बिजली का बिल क्यों बढ़ गया, किसानों की फसल का दाम क्या है, वह अचानक वैश्विक राजनीति के एक ऐसे रहस्य से परिचित हो गया जो शायद रूस की संसद को भी ज्ञात न हो। मैंने उसी क्षण समझ लिया कि पत्रकारिता का स्वर्ण युग लौट आया है। अब आप सोचिए, अर्थशास्त्री वर्षों तक जीडीपी, महँगाई और राजकोषीय घाटे की चर्चा करते रहते हैं। वैज्ञानिक रात-दिन प्रयोगशालाओं में सिर खपाते हैं। कूटनीतिज्ञ देशों के बीच संबंध सुधारने के लिए बैठकें करते हैं। परन्तु इनमें से कोई भी व्यक्ति यह नहीं बता सकता कि पुतिन के तवे पर सुबह क्या चढ़ता है। यही तो खोजी पत्रकारिता है! जिस प्रकार पुराणों में ऋषि-मुनि दिव्य दृष्टि से तीनों लोकों का ज्ञान प्राप्त कर लेते थे, उसी प्रकार आज का खोजी पत्रकार हजारों किलोमीटर दूर किसी राष्ट्रपति की प्लेट में झाँककर राष्ट्रहित की सामग्री खोज निकालता है। एक समय था जब पत्रकार युद्धभूमि में जाकर मोर्चे की स्थिति बताते थे। आज वे नाश्ते की मेज़ तक पहुँच चुके हैं। यह प्रगति है। इसे विकास कहते हैं। अब देश में शिक्षा के क्षेत्र को ही देख लीजिए। बेचारे कोचिंग संस्थान बच्चों को गणित, विज्ञान, इतिहास और भूगोल पढ़ाने में लगे हैं। वे न्यूटन का नियम समझा देंगे, पर यह नहीं बता पाएँगे कि किसी अंतरराष्ट्रीय नेता की पसंदीदा चाय में कितनी चीनी पड़ती है। वे संविधान पढ़ा देंगे, पर यह नहीं बताएँगे कि कौन-सा नेता सुबह योग करता है और कौन-सा नेता केवल योग की फोटो खिंचवाता है। इसलिए आज के युग में कोचिंग से ज्यादा महत्व कैमरे का है। कभी-कभी लगता है कि भविष्य में प्रतियोगी परीक्षाओं का स्वरूप भी बदल जाएगा। प्रश्न होगा— "विश्व शांति पर सबसे अधिक प्रभाव किसका पड़ता है?" (क) संयुक्त राष्ट्र (ख) आर्थिक नीतियाँ (ग) वैज्ञानिक अनुसंधान (घ) पुतिन के नाश्ते का मेन्यू और उत्तर होगा—(घ)। क्योंकि यदि किसी चैनल ने उसे ब्रेकिंग न्यूज़ बना दिया है तो निश्चय ही उसका वैश्विक महत्व होगा। मुझे एक काल्पनिक विश्वविद्यालय की कल्पना आती है जहाँ "मीडिया विज्ञान" का नया विभाग खुला है। वहाँ छात्रों को सिखाया जाता है कि किसी सामान्य सूचना को राष्ट्रीय संकट में कैसे बदला जाए। पहले वर्ष में विषय होता है—"कैमरे के सामने भौंहें चढ़ाने की कला।" दूसरे वर्ष में—"एक वाक्य को दस बार अलग-अलग संगीत के साथ प्रस्तुत करना।" और अंतिम वर्ष में शोध प्रबंध— "बटेर के अंडों का अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर प्रभाव।" विश्वविद्यालय के कुलपति बड़े गर्व से बताते हैं कि उनके यहाँ से निकले छात्र अब देश की जनता को वही बताते हैं जो जनता ने कभी जानना ही नहीं चाहा। दरअसल आधुनिक पत्रकारिता का सबसे बड़ा योगदान यही है कि उसने आवश्यकता और जिज्ञासा का अंतर समाप्त कर दिया है। पहले लोग वह जानना चाहते थे जो उनके जीवन को प्रभावित करे। अब लोग वह जानने लगे हैं जिसे देखकर वे अगले पाँच मिनट तक सोशल मीडिया पर चर्चा कर सकें। समाचार अब सूचना कम, मनोरंजन अधिक हो गया है। कमेंट्री और टिप्पणी के इस युग में तथ्य बेचारे कोने में खड़े रहते हैं। कैमरा सामने आ जाता है, कैप्शन चमकने लगता है और कमेंट्स की सेना युद्ध छेड़ देती है। सच्चाई धीरे-धीरे चलती है, परन्तु सनसनी रॉकेट की गति से दौड़ती है। और दर्शक? वह भी कम दिलचस्प पात्र नहीं है। वह महँगाई पर पाँच मिनट नहीं टिकता, लेकिन किसी सेलिब्रिटी के पालतू कुत्ते की बीमारी पर आधा घंटा देख सकता है। वह विज्ञान की उपलब्धियों पर ऊब जाता है, लेकिन किसी नेता के जूतों के ब्रांड पर बहस कर सकता है। इसलिए पत्रकारिता केवल वही परोस रही है जिसकी माँग है। दोष पूरी तरह रसोइए का भी नहीं है; भोजन की पसंद भी तो ग्राहक ही तय करता है। अवधी में कहें तो—"जैइस मनई, तैइस तमासा।" जब समाज गंभीर प्रश्नों की जगह चमकदार प्रश्नों को महत्व देने लगे, तब कैमरा भी वहीं घूमेगा जहाँ तालियाँ मिलें। फिर भी आशा बची हुई है। क्योंकि कभी-कभी किसी शोरगुल भरे स्टूडियो के बीच कोई पत्रकार अब भी कठिन प्रश्न पूछता दिखाई दे जाता है। कोई अब भी आँकड़ों की धूल झाड़कर सच्चाई खोजने निकल पड़ता है। कोई अब भी जनता और सत्ता के बीच सेतु बनने का प्रयास करता है। वही पत्रकारिता की वास्तविक आत्मा है। बाकी तो बटेर के अंडे हैं—आते हैं, टूटते हैं, ऑमलेट बनते हैं और अगले दिन किसी नई ब्रेकिंग न्यूज़ के साथ भुला दिए जाते हैं। राष्ट्र का निर्माण कैमरे से नहीं, चरित्र से होता है; कैप्शन से नहीं, चिंतन से होता है; और कमेंट्स से नहीं, कर्म से होता है। लेकिन तब तक, कृपया टीवी देखते रहिए। संभव है कल हमें यह महत्वपूर्ण जानकारी मिले कि विश्व राजनीति में कबूतर के दाने और वैश्विक अर्थव्यवस्था में तोते की मिर्च का क्या योगदान है। प्रोफेसर सुधीर दीक्षित, पूर्व प्रिंसिपल, गवर्नमेंट गर्ल्स डिग्री कॉलेज, भिण्ड (मध्य प्रदेश)

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