*कविवर श्री सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की सरस्वती वंदना*
वर दे, वीणावादिनि वर दे!
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव भारत में भर दे!
काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर जगमग जग कर दे!
नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को नव पर, नव स्वर दे!
वर दे, वीणावादिनि वर दे।
*मेरी विस्तार रचना*
*सरस्वती वंदना*
स्वर दो माँ, स्वर दो माँ, स्वर दो माँ,
वीणा-वादिनि, स्वर दो माँ,
दूर करो तन मन तम बंधन,
ज्योतिर्मय जगमग कर जीवन,
तनमन मधुरस बनकर चमके,
धवलित जग कर दो माँ,
वीणा-वादिनि स्वर दो माँ।
छन्द नवल दो, नूतन स्वर दो,
नव प्रकार दो, दो नव वन्दन,
मातु शारदे, नूतन वर दो,
ताल नवल लय दो माँ,
वीणा-वादिनि स्वर दो माँ।
विद्यादायिनि दया करो माँ,
स्वीकार करो नव अभिनन्दन,
ओज शक्ति नव दे दो जननी,
सरगम नव गति दो माँ,
वीणा वादिनि स्वर दो माँ।
विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल
आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ:19 जनवरी 2026
स्वरचित/ मौलिक
सरस्वती वंदना
सरस्वती वंदना
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