कलम संगिनी

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मटका

HARNARAYAN KURREY

HARNARAYAN KURREY

1 Followers 93 Posts Oct 2025

मटका

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मटका
शिर्षक -मटका विधा - कविता श्रेणी - प्रकृति धूप कड़ी हो, लू चलती हो, जब नभ से बरसें अंगारे, तब तन–मन को शीतल करता मटका जल के मधुर सहारे। माटी की कोख सजाकर इसे कुंभार ने गढ़ा स्नेह से, घूमती चाक पर धीरज भर रूप दिया अपने श्रम–वेश से। न मौसमी ठंडक इसमें, न बिजली की कोई चाल, फिर भी जल का हर घूंट कहता — "प्रकृति ही सबसे बड़ी ढाल।" ओ मातृभूमि की सौंधी गंध, तू मटके में बस जाती है, घड़े के जल में बस कर हर दिन जीवन को नव ऊर्जा देती है। मटका केवल पात्र नहीं है, ये संस्कृति का अभिमान, सरल जीवन की ये शिक्षा — "सादगी में ही छिपा स्वाद महान।" रचनाकार - कौशल, मुड़पार चु, पोस्ट रसौटा, तहसील पामगढ़, जिला जांजगीर चांपा, छत्तीसगढ़

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